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बलि प्रथा-बलराम-सिंह

बलि प्रथा हमारे समाज में एक प्रारामपरिक अभिश्राप है।
जो बरसो से चली आ रही है,अभी भी हमारे देश में बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां नवरात्रि इत्यादि पर्व पर बलि प्रदान करते हैं।
मुसलमान भी बकरी ईद पर बकरों का बलि ही देते है।
क्या हमने कभी सोचा है कि जिनको हम जबर्जस्ती मजबूर कर के बलि देते हैं उस बक्त उन पर क्या बितती है।
वो बेजुबान जानवर अपनी सफाई में कुछ बोल भी नहीं सकते।
अगर बोल सकता तो अवश्य फरियाद करता और कहता कि बोलो जलादो मेरा क्या कसूर है कि मुझे विना किसी अपराध के क्यों हत्या करते हो मेरा कसूर तो बतादो।
हम जिस देवी मां को बलि समर्पित करते हैं क्या उन्होंने कभी कहा है कि मुझे बकरा या किसी अन्य पशु की बलि दो।
नहीं कभी नहीं क्यों की वो जगत जननी मां है, सारे जीव जन्तु पशु पक्षी मानव यहां तक की जीव मात्र की मां है और मां कभी भी अपने पुत्र की बली नहीं ले सकती, मां के लिए भी जीव एक समान है और हमारे शास्त्रों में भी जीव हत्या को सबसे जघन्य पाप माना गया है और कहा गया है कि (आत्मा प्रति कुलानी,परे साम ना समाचरे) अर्थात जो चीज अपने साथ बुरा लगे वो किसी दूसरे के साथ मत करो।
क्या हम अपने पुत्र को बलि दे सकते हैं नहीं क्यों की अपना पुत्र सबको प्यारा है
उसी तरह हर जीव को अपना पुत्र प्यारा होता है
क्या मा इस बली से प्रसन्न होती होंगी,नहीं कदापि नहीं क्यों की उन्हीं का बेटा को उन्हीं के सामने हत्या की जाती हो तो मां कैसे प्रसन् होगी ।
अगर मां को सच में प्रसन्न करना है तो जीव दया करो,किसी जीव को संकट में देखकर उनकी रक्षा करो, दूसरों को भलाई करो।
अगर मां को अर्पित करना ही चाहते हो तो मन अर्पित करो,अगर मां को बलि चढ़ना ही चाहते हो तो,अपने क्रोध को बलि चढ़ा ओ,।
तभी मां या अन्य कोई भी देवता प्रसन्न होंगे

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