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चेतन मन-वीरेंद्र देवांगना

चेतन मन::
चेतन मन विचारों का कारखाना है, जिसमें असीमित व अनगिनत विचारों का उत्पादन निरंतर होता रहता है। इसे हम चैतन्य दिमाग भी कहते हैं। इसे चैतन्य दिमाग, इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह प्रतिपल नई व ताजगीपूर्ण विचार, ज्ञान व जानकारी से हमें लैश करता रहता है। यह पुरानी जानकारियों से नई जानकारी की तुलना करके उसकी कीमत निर्धारण करता है कि वह काम के लायक है या नहीं। इसी से हम तय करते हैं कि हमें आगे क्या करना है?
चेतनायुक्त इस दिमाग में सोचने-विचारने की क्षमता होती है। यह किसी विचार को पसंदगी के अनुसार मंजूर या नामंजूर कर सकता है। इस लिहाज से, यही मन का राजा है। जब हम किसी काम को करने या न करने का फैसला करते हैं, तब इसी चेतनासम्पन्न मन की मर्जी से करते हैं। फिल्मी तर्ज पर गाए गए गाना ‘मैं चाहे, ये करूं; चाहे, वो करूं; मेरी मर्जी’ इसी चंचल मन की देन है।
देह के संचालन की ताकत इसी चेतन मन के पास है। ताकत देह के पास है, पर देहरूपी गाड़ी का वास्तविक चालक चेतन मन है।
इसे एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मैं जागरूकता के साथ, जो लिख रहा हूं, वह विचार, भाव, शब्द, आंकड़े अवचेतन मन में संग्रहित हैं, लेकिन उसका प्रयोग चैतन्यता के साथ चेतन मन से किया जा रहा है। इसी तरह आप जो पढ़/देख-सुन रहे हैं, वे चेतन मन से कर रहे हैं, पर स्मरण करने का काम अवचेतन मन कर रहा है।
अर्थात्, लिखने, देखने, सुनने, पढ़ने का काम चेतन मन का है; परंतु उसे स्मृति में सुरक्षित व संरक्षित रखने का काम अवचेतन मन का है। सारी सामग्री चेतन मन से होते हुए, अवचेतन मन में जाती है। जब जरूरत पड़ती है, तब यही संरक्षित सामग्री चेतन मन के माध्यम से हमारे कर्मों व क्रियाकलापों में उतर आती है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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