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चिंता या तनाव-वीरेंद्र देवांगना

चिंता या तनाव::
तनाव सभी के जीवन में है। चाहे कोई राजा हो या रंक; अमीर हो या गरीब; गृहस्थ हो या कर्तव्यस्थ; गृहणी हो या कामकाजी। फर्क सिर्फ इतना है कि यह किसी में थोड़ा ज्यादा है, तो किसी में थोड़ा कम। तनाव आज के जीवन का पर्याय बन चुका है। दूसरे शब्दों में, तनाव है, तो जीवन है। जीवन है, तो तनाव है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कारण कि इसी तनाव से जीवन में गति, प्रगति और उन्नति आती है, वरना जीवन तो सीधा-सपाट है, जिसमें न कोई उथल-पुथल है; न हलचल। क्या आप गतिहीन, प्रगतिहीन, व उन्नतिहीन जीवन को जीवन कहेंगे? नहीं न!
ऐसा जीवन तो पशु-पक्षियों का हो सकता है, मनुष्यों का नहीं। मनुष्य का जीवन तो गतिवान, प्रगतिवान व उन्नतिवान हुआ करता है। लेकिन, यह मांगता है थोड़ी-सी चिंता और थोड़े-सा तनाव। इसलिए तनाव जहां फायदेमंद है, वहीं तनावरहित सपाट जीवन नुकसानदेह।
फर्ज करो कि आपने लक्ष्य हासिल करने के लिए एक साल का समय निर्धारित किया हुआ है। लेकिन, आपके पास लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोई कार्ययोजना नहीं है।
बस, अललटप्प तैयारी में लगे हैं आप। चूंकि आपने तनाव को दरकिनार कर दिया है, इसलिए तैयारी भी तनावरहित हो गई है। किंतु, यह तनावरहित तैयारी आपको लक्ष्य में जुटने नहीं देती, उससे विमुख करती है। यहां आपको लक्ष्य को पाने का तनाव पालना होगा, तैयारी का तनाव पालना होगा, तभी बात बनेगी, अन्यथा तनावरहित तैयारी आपको सफलता से दूर ले जाएगी।
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