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कोरोनाकाल और महाभारत के युद्ध-नियम एक-जैसेः-वीरेंद्र देवांगना

कोरोनाकाल और महाभारत के युद्ध-नियम एक-जैसेः
कोरोनाकाल के नियम व व्यूह को हम कुरुक्षेत्र के रणनियम से समझकर पालन कर सकते थे, लेकिन हमने नहीं किया। इसी का दुष्परिणाम है कि 07 अक्टूबर 2020 तक भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या 67 लाख को पार कर गई है और मौतों की संख्या 1 लाख 4 हजार के पार पहुंच गई है।
महाभारत-युद्ध की सकल संरचना महानायक श्रीकृष्ण को सौंपी गई थी। नियम क्या होंगे? कैसे होंगे? कब होंगे? कौन किससे लडे़गा? यह सब श्रीकृष्ण की रणनिष्ठा पर छोड़ते हुए दोनों ओर के सेनापतियों ने अपनी सहमति जताई थी। इस युद्ध के कौरवों के प्रारंभिक सेनापति भीष्म पितामह थे, तो पांडवों के पहले व आखिरी सेनापति धृष्टधुम्न थे, जो दु्रपद पुत्र थे।
महाभारत-युद्ध में रात को सारे योद्धा अपने-अपने शिविर व तंबू में पहुंच जाया करते थे। वे आपस में चर्चा तो करते थे, शत्रुपक्ष से दुःख-सुख पूछ लिया करते थे। कारण कि यह युद्ध अपने-अपनों से ही था। अपने-अपने शिविरों में रात को रहना। दिन में युद्ध करना। धर्मानुसार युद्ध करना, यही युद्धनीति का आधारभूत सिद्धांत था।
सब एक-दूसरे से किसी-न-किसी रूप में जुड़े हुए भी थे। वे एक ओर सामाजिक व व्यक्तिगत दूरी बनाए हुए थे, जिसे सोशल व फिजिकल डिस्टेंडिंग कहा जा सकता है, तो दूसरी ओर रणक्षेत्र के नियम अर्थात लाकडाउन के नियमों का पालन कर रहे थे।
दिन को जब युद्धारंभ होता था, तब अपने-अपने सेनानियों को लेकर व्यूहरचना करते थे। इस रणनीति में पदाति, पदाति के साथ, रथी, रथी के साथ, महारथी, महारथी के साथ, अतिरथी, अतिरथी के साथ, घुड़सवार, घुड़सवार के साथ और गजसवार, गजसवार के साथ, वीर, वीर के साथ, तो महावीर, महावीर के साथ अपनी रणकौशल दिखाता था। वह भी एक निश्चित दूरी व अस्त्र-शस्त्र के साथ।
किसी घायल को नहीं मारने, मूर्छितों के उपचारार्थ लगे हुए लोगों पर हमला नहीं करने, पीठ पीछे से वार न करने, धोखे से वार न करने तथा ‘सावधान’ करते हुए वार करने, एक के विरूद्ध एक लड़ने व सूर्योदय से सूर्यास्त तक युद्ध होने की बात दोनों प़क्षों के सेनानायकों के समक्ष बात कहीं गई थी।
किंतु, इसमें एक विशेष बात यह थी कि नियम बनाना, नियमों का पालन करवाना श्रीकृष्ण का काम था, तो नियम तोड़ना और मनमानी करना मामा शकुनि व दुर्योधन अपना परमधरम समझते थे।
जब कौरवों के द्वारा चक्रव्यूह की रचना की गई, तब पांडवों में चक्रव्यूह तोड़ने की सक्षमता अर्जुन व श्रीकृष्ण में ही थी, लेकिन उन्हें एक षड़यंत्र के तहत इतना दूर ले जाया गया कि वे चक्रव्यूह तोड़ने के लिए युद्ध-मैदान में उपस्थित न रह सके। तभी उत्साही नवयुवक अर्जुनपुत्र अभिमन्यु सामने आया, जिसे चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो आता था, परंतु चक्रव्यूह से निकलना नहीं पता था।
वे चक्रव्यूह भेदकर अंदर तो प्रतिष्ठ हो गए, किंतु निकलना न जानने से वहीं फंस गए। उन्हें कौरवों के आठ शूरवीरों ने घेरकर नृशंसतापूर्वक मार डाला। जो युद्धनियम एक के विरूद्ध एक लड़ने का दोनों सेनापतियों ने बनाया था, उसको कौरवों ने सबसे पहले तोड़ा। इसके बाद कुरुक्षेत्र-युद्धक्षेत्र में न नियम रहा, न नैतिकता। दोनों ओर से एक के बाद एक युद्ध-नियम तोड़े जाने लगे।
लाकडाउन के संदर्भ में भी शुरू-शुरू में तालाबंदी का पालन खूब किया गया, लेकिन जैसे ही मजदूरों की घर वापसी की अफरातफरी मची, सरकारों के द्वारा बनाए गए सारे नियम-कायदे कानून सरकारों ने ही तोड़ना आरंभ कर दिया।
मजदूरों को भेड़-बकरियों व ढोर-गंवारों की तरह ट्रकों, बसों में लादकर उनके गृहग्रामों व शहरों में ले जाकर पटक दिया गया। न कोई जांच की गई, न पड़ताल कि वे कोरोना प्रभावित हैं या नहीं। इससे कोरोना का संकट बद-से-बदतर होता चला गया।
अब, हमें ही तय करना है कि हमें श्रीकृष्ण के साथ रहना है या शकुनि के साथ। शासन के द्वारा बनाए नियमों का पालन कर कोरोना के खिलाफ युद्धनीति से चलना श्रीकृष्ण का साथ है, तो मुखौटा धारण नहीं करना, पृथकवास में नहीं रहना, तालाबंदी के नियमों का उल्लंधन करना और शुद्धीकरण को नहीं अपनाना कपटी शकुनि की पथभ्रष्ट राह है।
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