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गांधी जयंती पर विशेषःः स्वच्छता और महिला सशक्तीकरण के पक्षधर-वीरेंद्र देवांगना

गांधी जयंती पर विशेषःः
स्वच्छता और महिला सशक्तीकरण के पक्षधर
1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले के निर्देश पर गांधीजी ने पूरे देश की यात्रा की थी। उन्होंने जहां तीर्थ-स्थलों का भ्रमण किया, वहीं गांव की गलियों में रात्रि विश्राम किया। उन्हें देखकर यह घोर आश्चर्य हुआ कि गांव गंदगियों से पटा पड़ा है, लेकिन लोगों की सेहत पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।
उनके देशाटन के दौरान देश-विदेश में स्पैनिश फ्लू का ऐसा कहर छाया हुआ था कि लोग मिनटों में काल-कलवित हो रहे थे। यह वैसा ही दौर था, जैसा 2020-21 में कोरोना का कहर चल रहा है। तब देश महामारी से कराह रहा था। तब भी क्वारेंटाइन, आइसोलेशन, मास्क आदि शब्दों का इस्तेमाल किया रहा था।
उन्होंने देखा कि इसका बड़ा कारण गांव में व्याप्त गंदगियां, अशिक्षा और जागरूकता का अभाव है। इसके लिए उन्होंने लोगों को जागरूक कर स्वच्छता अभियान चलाया। उनका कहना था कि जैसे महिलाएं घर को साफ-सुथरा और स्वच्छ रखती हैं, वैसे ही हर नागरिक का यह परम कर्तव्य है कि वे गांव को स्वच्छ रखें, तभी महामारी और अन्य बीमारी से मुक्ति मिल सकती है।
उनके सादगीपूर्ण जीवनशैली को देखकर लोगों का उनपर विश्वास जमने लगा और वे उनके आव्हान पर गांव की साफ-सफाई में जुट गए। इसमें उन्होंने देखा कि सफाई के इस महती कार्य में जहां पुरुष थोड़ी हीला-हवाला कर रहे हैं, वहीं महिलाएं स्वस्फूर्त मन से इस काम में लग गई हंै।
यहीं से उन्हें महिला सशक्तीकरण का विचार आया। वे बचपन से अपनी मां को सफाई करते हुए देखा करते थे। इसलिए उन्होंने इस विचार को और पुख्ता कर लिया। उन्होंने देखा कि स्वच्छता अभियान और नारी के उत्थान में अन्योनाश्रित संबंध हैं।
उन्होंने चंपारण भूमि पर इसका प्रयोग किया। उन्होंने कस्तूरबा गांधी के साथ महसूसा कि महिलाएं उनकी सच्ची सहयोगी हो सकती हैं। गांधी ने उनका भरोसा किया और महिलाओं ने भी उन्हें निराश नहीं किया।
यहीं उन्हें पुरुषों से समान अधिकार की बात सूझी। इसके लिए उन्होंने उन्हें चरखा पकड़ाया, ताकि स्वावलंबी बनकर देशोत्थान के अहम काम में लग जाएं। उन्होंने स्त्रियों का अव्हान किया कि घर-परिवार में जब भी उनके साथ दुव्र्यवहार हो, उन्हें हिंसा-अहिंसा का विचार त्यागकर अपने ईश्वर प्रदत्त बल का प्रयोग करना सीखें। आत्मरक्षा सबका परमधर्म है। नारी को अबला नहीं, सबला बनना चाहिए।
गांधीजी द्वारा दिखाया मार्ग आज भी प्रासंगिक है। यही कारण है कि आज देश में नारीसुलभ भाव के रक्षार्थ अनेक कायदे-कानून अस्तित्व में हैं, जो नारी को संभल व हक प्रदान करते हैं।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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