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गांधी-जयंती पर विशेषःः गांधीजी का आत्म-संयम-वीरेंद्र देवांगना

गांधी-जयंती पर विशेषःः
गांधीजी का आत्म-संयम::
गांधीजी आत्मसंयम को जीवन का आधार मानते थे। उनका कहना था इंसान का जीवन बगैर संयम के कुछ भी नहीं है। यह संयम हर उस चीज में रखा जाना चाहिए, जो उसके लिए जरूरी है।
प्रारंभ में वे चाय के शौकीन थे। एक दिन उनके एक मित्र ने कहा कि गांधीजी चाय में क्या रखा है? इसमें उत्तेजक पदार्थ टैनिन रहता है, जो शरीर के लिए नुकसानदेह है। इतना सुनना था कि नुकसान की आशंका से उन्होंने तुरंत चाय छोड़ने का फैसला कर लिया।
ऐसा ही वाकिया यहूदी वास्तुकार हरमन केलेनबाख के साथ भी दरपेश हुआ। वे 1903 से 1914 के मध्य दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के से परिचित हुए थे। उन्होंने गांधीजी की ‘सादा जीवन व उच्च विचार’ जीवनशैली से काफी प्रभावित होकर अपने खर्चों में कटौती करना आरंभ कर दिया, जिससे उनका तब का मासिक खर्च 1200 से घटकर महज 120 रुपया रह गया। ऐसा असर तो वही महात्मा किसी के जीवन में डाल सकता है, जो कथनी व करनी के अंतर को मिटा देता है।
उनके आत्मसंयम की ही बानगी थी कि अंग्रेज उनके उपवासों से न केवल चकित रहा करते थे, अपितु भयभीत भी थे। वे जब 21 दिन का उपवास करते थे, तो अंग्रेजों के कान खड़े हो जाते थे और विशेषज्ञों को बुलवाकर जांच-पड़ताल किया करते थे कि इस हाड़-मांस के पुतले में ऐसी कौन-सी शक्ति है, जो उन्हें भूखे रहने के लिए प्रेरित किया करती है।
मई 1942 की झुलसाती गरमी में गांधीजी के साथ उनके सेवाधाम आश्रम में अमेरिकी लेखक लुई फिशर ठहरे हुए थे। एक दिन लुई फिशर को बगैर नमक का खाना मिला, तो वे कुनमुनाने लगे। इसपर गांधीजी ने कहा,‘‘वे चाहें तो उसमें नींबू मिला सकते हैं।’’
इसपर फिशर को कहना पड़ा,‘‘गांधीजी आप इतने अहिंसक हैं कि स्वाद को मारना नहीं चाहते।’
लुई फिशर ने उनपर किताब लिखी-‘द लाइफ आफ महात्मा’, जो काफी चर्चित रही। कहा जाता है कि रिचर्ड एटनबरो ने ‘गांधी’ फिल्म का निर्माण इन्हीं प्रेरक वाकियों से प्रेरित होकर किया था।
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