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गांधी-जयंती पर विशेषःः गांधी-दर्शन-वीरेंद्र देवांगना

गांधी-जयंती पर विशेषःः
गांधी-दर्शनःः
गांधीजी का कहना था कि उनका जीवन ही दर्शन का संदेश है। एक बार वे इलाहाबाद में खाना खाकर उठे, तो नेहरूजी उनका हाथ धुला रहे थे। इसी वक्त एक सज्जन उनसे बात करने लगे। वे बातों में इतने खो गए कि उन्हें याद ही नहीं रहा कि कोई उनका हाथ धुला रहा है। जब बातें खत्म हुई, तो उन्होंने नेहरू से कहा, ‘‘जवाहर तुमने पानी बरबाद किया, लेकिन मेरा हाथ नहीं धुला।’’
इसपर नेहरू ने जवाब दिया,‘‘गांधी जी, आप कतई परेशान न हों। यह वर्धा नहीं, इलाहाबाद है। यहां गंगा व जमुना दोनों बहती है।’’
‘‘जरूर। जवाहरलाल, पर ये गंगा और यमुना आपके और मेरे लिए नहीं, पूरे विश्व के लिए हैं। पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों के लिए भी हैं।’’ ऐसी थी गांधीजी की सोच।
गांधीजी की विचारधारा को गांधी-दर्शन कहा जाता है, जो भारतीय दर्शन के तत्वों से प्रेरित व प्रभावित है। वे ईश्वर को सृष्टि का मूल मानते हैं। गांधीजी का कथन है,‘‘मुझे जगत के मूल मंे राम के दर्शन होते हैं।’’
उन्होंने प्रभु राम के आदर्शों के आधार पर रामराज्य की परिकल्पना किया था। उनके मुख में सदा रामनाम रहा और हाथ में गीता। यही कारण है कि जब उनका देहांत हो रहा था, तब भी उन्होंने ‘हे राम’ कहा था।
वे भगवान राम व श्रीकृष्ण के अनुयायी थे। उनका कहना था कि इनका जन्म ही असत्य पर सत्य की जीत के लिए हुआ था। उनका ‘सत्य के प्रयोग’ इन्हीं महामानवों से अभिप्रेरित रहा। गांधीजी सद्प्रवृत्तियों को सत्य और दुष्प्रवृत्तियों को असत्य की संज्ञा देते हैं।
उनका कहना है कि मनुष्य में पशुत्व व देवत्व समान रूप में है। जो मनुष्य त्याग, प्रेम, उदारता और निःस्वार्थता को अपनाता है, वह पशुता पर विजय पा लेता है। उनका मानना है कि जो असत्य है, अनैतिक है, वह हिंसा है। वह अहिंसा को अन्याय व अत्याचार के खिलाफ बड़ी ताकत मानते हैं।
उनका विचार था कि हिंसा का निवारण हिंसा से नहीं, अपितु अहिंसा से किया जा सकता है। उनके द्वारा प्रायोजित असहयोग व सत्याग्रह आंदोलन इन्हीं सद्विचारों का प्रतिफल व प्रतिरूप था। उनके विचार आदर्शों से प्रभावित व संचालित थे। यही वजह है कि श्रीराम उनके आराध्य और श्रीकृष्ण दिग्दर्शक थे।
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