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जीवनशैली का आदर्श समयचक्र-वीरेंद्र देवांगना

जीवनशैली का आदर्श समयचक्र::
बेहतर जीवन जीने के लिए जिस तरह समय-प्रबंधन की सख्त जरूरत होती है, उसी तरह अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखने की भी आवश्यकता होती है।
ऐसा नहीं कि आपने काम के लिए वक्त की पाबंदी पर ध्यान तो दिया, लेकिन दैनंदिन जीवनशैली की ओर से बेपरवाही बरता, तो आपका समय-प्रबंधन धरा-का-धरा रह जाएगा। आप काम तो बहुत कुछ करना चाहेंगे, लेकिन अव्यवस्थित दिनचर्या की वजह से आपका काम पिछड़ जाएगा।
मानलो आप सुबह छह बजे उठने का नियम बनाते हैं, तो आपको हर हाल में 11 बजे से पहले सोना पड़ेगा, तभी आप 7 घंटे की गहरी नींद लेकर सुबह छह बजे तरोताजा होकर उठेंगे।
इसके लिए जहां आपको देररात जागरण को टालना होगा, वहीं पार्टीबाजी, गपशप, टीवी और मोबाइल से दूरी बनाकर चलना पड़ेगा। हां, काम के आधिक्य को कम करने रात्रि जागरण किया जाता है, तो यह मजबूरी हो सकती है, लेकिन फिर आपको दोपहर को आराम करने की जरूरत पड़ सकती है।
वस्तुतः, यह व्यक्तिगत मामला है, जिसपर व्यक्ति को स्वयं फैसला लेना होता है; क्योंकि हर इंसान के पास दिन के 24 घंटे ही होते हैं। उसी समय को वह अपने काम व अपनी दिनचर्या में बांटकर चलता पड़ता है।
लिजिए पेश है-सुबह से रात तक का वह आदर्श समयचक्र जिसको अपना कर अधिकांश लोगों ने कामयाबी की इबारत लिखी है।
सुबह उठना- प्रातः 06 बजे
शौच व मंजन- 07 बजे तक
योग, प्राणायाम व कसरत आदि- 07 से 08 बजे के मध्य
स्नान-ध्यान- 08.30 तक
यदि लंच दोपहर को लेना हो, तो नाश्ता- 09 बजे तक
यदि दोपहर का लंच लेने का समय व अवसर न मिले, तो नाश्ता के बजाय सीधे लंच- 10 से 11 बजे के बीच
यदि सुबह का नाश्ता लिया हो, तो दोपहर का लंच- 01 से 02 के मध्य
यदि सुबह के नाश्ता के बजाय सीधे लंच लिया हो, तो शाम का जलपान आवश्यक हुआ, तो- 03 से 04 के बीच
शाम की सैर- 07 से 08 के मध्य
डिनर- 08 से 09 के मध्य
शयन- 10 से 11 के मध्य
विशेष टीपः कुछ लोग आदर्श जीवनशैली के समयचक्र को मानना नहीं चाहते। इसे बकवास समझते हैं। उनके लिए जरूरी नहीं कि वे इसे अपनाएं। वे चाहें, तो अललटप्प जीवनशैली को अपना सकते हैं। क्योंकि जीवन है उनका। वे जैसे चाहे, वैसे जी सकते हैं। यह उनकी मर्जी।
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