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लेखन की चुनौतीः भाग-3:: ‘कि’ और ‘की’ का अंतर::-वीरेंद्र देवांगना

लेखन की चुनौतीः भाग-3::
‘कि’ और ‘की’ का अंतर::
एक लेखक को, जो लेखन को अपना कर्म मानता है, उसके लिए यह जरूरी है कि वह ‘कि’ और ‘की’ के अंतर को भलीभांति समझे और अपनी रचनाओं में इन शब्दों का उचित प्रयोग करे।
‘कि’ अव्यय है, जिसका रूपांतर या फेरबदल नहीं होता। यह दो शब्द अथवा मिश्र या संयुक्त वाक्यों या वाक्यांशों के अंतर को स्पष्ट करता है।
जैसे-यह औरत है कि आफत। वह राम है कि श्याम। तुम सीता की मां हो कि गीता की। तुम खाना खाओगे कि फल खाओगे कि जूस पीकर रह जाओगे। वह कल आएगा कि परसों; कुछ कहा नहीं जा सकता।
गौर करनेवाली बात यह भी कि ‘कि’ की जगह यदि हम ‘या’ का प्रयोग करें, तो वाक्य-विन्यास में कोई खास अंतर नहीं पड़ता। उपर्युक्त वाक्यांशों में ‘कि’ की जगह ‘या’ का प्रयोग करके देखिए। वाक्य सही प्रतीत होंगे।
‘कि’ अल्पविराम का द्योतक भी है। वाक्य में यदि अल्पविराम नहीं लगाना है, तो ‘कि’ से काम चलाया जा सकता है और लगाना है, तो ‘कि’ के बिना भी काम चलता है। फिर शेष वाक्य को संवादशैली में इनवर्टेट कामा में रखा जाता है।
उदाहरण देखिए-प्रधानमंत्री ने कहा कि वे कल अयोध्या जाएंगे। प्रधानमंत्री ने कहा,‘‘वे कल अयोध्या जाएंगे।’’
उपर्युक्त दोनों वाक्य व्याकरण की दृष्टि से सही हैं।
कुछ लेखक ‘कि’ लिखकर मिश्र वाक्य तो बनाते हैं, लेकिन वे ‘कि’ के तत्काल बाद अल्पविराम का चिन्ह (,) कामा भी लगा देते हैं, जो व्याकरण की दृष्टि से द्विरुक्ति दोष कहलाता है। उम्दा लेखक बनने के लिए ऐसे अनाड़ीपन से जितना बचा जा सकता है, प्रयासपूर्वक बचा जाना चाहिए।
अब, समझते हैं कि ‘की’ भाषाविज्ञान की दृष्टि से कौन-सा शब्द है? ‘की’ संबंधवाचक सर्वनाम और एकवचनी है। यह स्त्रीलिंगी है। इसके पुल्लिंग और बहुवचन रूप क्रमशः ‘‘का और के’’ हैं। जैसा कि इसके सार्वनामिक प्रकार से अभिहित है, ‘की’ एक संज्ञा शब्द का संबंध दूसरे स्त्रीलिंगी संज्ञा शब्द से व्यक्त करता है।
मिसाल के तौर पर-राधा की किताब। आलू की सब्जी। बबीता की पोशाक। बच्चों की पाठशाला। गाय की गौशाला। स्मृति की रचना। राधिका की साड़ी।
वाक्य देखिए-कल की बात है। कुत्ते की दुम पोंगड़ी से निकाली गई, तो टेढ़ी-की-टेढ़ी मिली।
दरअसल, हिंदी के नवोदित लेखकों को इसके अंतर को सही ढंग से न समझने का प्रधान कारण उनका ‘रोमन लिपि’ प्रेम है। रोमन लिपि में ‘कि’ और ‘की’ का भेद नहीं किया जाता। उसमें ‘केआई’ लिखकर दोनों के लिए काम चलाया जाता है। जबकि ‘देवनागरी लिपि’ में इसका भेद स्पष्ट तौर पर झलकता है।
इसलिए, हिंदी का अच्छा लेखक बनने के लिए रोमन लिपिप्रेम को त्यागकर हिंदी की वैज्ञानिक लिपि ‘देवनागरी’ को आत्मसात करना चाहिए। इससे भाषा, लिपि व वर्तनी-संबंधी बहुतेरी समस्याओं का यूं की समाधान हो जाएगा।
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome से जाकर amazom.com/Virendra Dewangan में देखा जा सकता है।

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