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लेखन की चुनौतीः भाग-6 ‘श्री’ और ‘जी’-वीरेंद्र देवांगना

लेखन की चुनौतीः भाग-6
‘श्री’ और ‘जी’::
ये दोनों शब्द आदर व्यक्त करनेवाले अव्यय हैं, जिसका क्षरण या रूप परिवर्तन नहीं होता। ‘श्री’ के आगे-पीछे दूसरे शब्द जोड़कर नए शब्दों का निर्माण किया जा सकता है। जैसे-‘श्री’ के आगे ‘सु’ प्रत्यय लगाने से ‘सुश्री’ बन जाता है, जो किसी सम्मानीय अविवाहित महिला के लिए प्रयुक्त होता है।
वाक्य प्रयोग देखिए-छग की राज्यपाल ‘सुश्री’ अनुसूइया उईके ने राजीम मेला का अवलोकन किया।
इसी तरह पिताश्री, जीजाश्री, काकाश्री, माताश्री, मातोश्री, चाचाश्री आदि को भी समझना चाहिए।
‘श्री’ में ‘मान’ उपसर्ग लगाकर श्रीमान् व श्रीमती शब्द का निर्माण किया जाता है। श्रीयुत, श्रीखंड, श्रीवास्तव, श्रीवास, श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रीनारायण व श्री 420 भी ऐसे ही उदाहरण हैं।
‘श्री’ और ‘जी’ आदरार्थ शब्द होने के कारण इनका प्रयोग किसी व्यक्ति के आगे और पीछे किया जाता है, लेकिन दोनों शब्दों का प्रयोग एक साथ एक ही व्यक्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए। न ही अपने नाम के आगे-पीछे खुद ही इसका प्रयोग करना चाहिए।
यदि अपने नाम के साथ आप स्वयं इसका प्रयोग कर देते हैं, तो यह अहंकारसूचक हो जाएगा। हां, कोई दूसरा व्यक्ति आपके नाम के साथ दोनों में-से किसी एक का प्रयोग करता है, तो सम्मानसूचक कहलाता है।
इसका आशय यह भी कि आप किसी व्यक्ति के आगे ‘श्री’ लगाएं, तो केवल ‘श्री’ ही लगाएं, उसके नाम या उपनाम के पीछे फिर ‘जी’ न लगाएं।
अनेक आमंत्रणपत्रों में खासकर किसी भूमिपूजन, शिलान्यास, लोकार्पण अथवा उद्घाटन में यह त्रुटि देखने को मिलती है कि वे किसी ‘सम्मानीय’ के प्रति ‘‘जरूरत से ज्यादा सम्मान’’ व्यक्त करने के लिए उसके नाम के आगे-पीछे ‘श्री’ और ‘जी’ दोनों लगा देते हैं। जैसे-श्री अखिलेश यादवजी द्वारा शिलान्यास। श्री रमन सिंहजी द्वारा लोकार्पण। जबकि इसका सही वाक्यांश होगा-श्री अखिलेश यादव द्वारा शिलान्यास। रमन सिंहजी द्वारा लोकार्पण।
‘जी’ जहां आदरयुक्त शब्द है, वहीं इसका प्रयोग मुहावरे के रूप में मन व चित्त के लिए किया जाता है। जी करना, जी मिचलाना, जी घबराना, जी भरना, जी न करना, जी उचट जाना, जी हजूरी करना आदि-इत्यादि।
यह स्वीकृतिसूचक व सहमतिद्योतक शब्द भी है। स्कूलों में जब बच्चों की हाजिरी ली जाती है, तब वे ‘जी सर’ कहकर ही अपनी हाजिरी देते हैं। इसी तरह कोई कार्य सौंपा जाए, तो ‘जी, मैं करूंगा’ कहा जाता है।
जब पत्नी, पति को ‘ऐ जी और वो जी’ पुकारती है, तब वह अपने पति के प्रति सम्मान ही दर्शाती है। यहां सिर्फ ‘ऐ या वो’ पुकारने या उनके साथ ‘जी’ लगाकर पुकारने में अंतर साफ झलकता है।
आधुनिककाल में जब पति-पत्नी हमपेशवर हो रहे हैं या प्रेम-विवाह कर रहे हैं या रिलेशनशिप में रह रहे हैं, तब वे अक्सर ‘ये राकेश, ये महेश, वो रणवीर, वो मुकेश’ संबोधित कर रहे हैं। इस संबोधन में आदर न होकर समानता का भाव दिखता है, जो आधुनिकता की देन कही जा सकती है।
‘जी’ के स्थानापन्न के रूप में कई जगह ‘जनाब, साहब या मिस्टर’ भी बोला जाता है, लेकिन वह उतना प्रभावी नहीं होता, जितना कि ‘जी’
सवाल यह कि ‘जी’ को नाम के साथ जोड़कर लिखा जाए या अलग। नियम कहता है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा के साथ ‘जी’ लिखना हो, तो उसे उपनाम के साथ जोड़कर लिखना चाहिए। जैसे-अटल बिहारी वाजपेयीजी, गांधीजी, नेहरूजी, माताजी, कक्काजी, दादाजी, काकाजी, मोदीजी आदि।
यहां नाम के साथ ऐसा लिखने की भूल कदापि न करें। जैसे अटलजी बिहारी वाजपेयी, महात्माजी गांधी, जवाहरलालजी नेहरू, नरेंद्रजी मोदी आदि। यह अटपटा लगेगा।
यद्यपि पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को नाम के साथ ‘जी’ लिखने का चलन हो गया है, जो सही लगता है, तथापि यह अपवाद है।
इसमें भी यदि सिर्फ जवाहरलालजी, नरंेद्रजी, अटलजी लिखते हैं और उनका उपनाम नहीं, तो यह ठीक प्रतीत होता है।
इसमें भी सम्मानार्थ ‘जी’ को अलग लिखा जाना चाहिए या शब्दों के साथ मिलाकर। यदि शब्दों के साथ मिलाकर लिखा जाए, तो ठीक प्रतीत होता है और जगह भी कम धेरता है। जैसे साहबजी आए हैं। गुरुजी कह रहे थे। महात्माजी ने कहा है। बहनजी आई हैं। आदि।
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