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लेखन की चुनौतीः भाग-8 अपने संपादक आप बनें-वीरेंद्र देवांगना

लेखन की चुनौतीः भाग-8
अपने संपादक आप बनें::
जो भाषाप्रेमी, अच्छा कवि या लेखक संजीदगी से बनना चाहता है, उसके लिए जरूरी है कि वह अपना संपादक आप बनंे। इसका आशय यह कि रचना का लेखन कर लेने के बाद वह अपने लिखे हुए को बार-बार पढ़ें और उस रचना को जितना हो सके, उतना संशोधन व परिमार्जन करके ही प्रकाशन के लिए भेजे।
जितना विचार आए, उसको एक बैठक में कागज में उतारना या लेपटाप/डेस्कटाप में टाइप करना आसान है, लेकिन लिखे हुए को एक संपादक की नजर से देखना कठिन। एक आम लेखक और खास लेखक में यही अंतर होता है।
आम लेखक जो है, जैसा है, ठीक है, सोचकर रचना को रचते ही प्रकाशनार्थ भेज देता है, जो साधारण पत्र-पत्रिकाओं में तो जस-के-तस छप जाता है।
कारण कि ऐसे पत्रों में प्रशिक्षित संपादकों का अभाव रहता है, जो रचनाओं को कांट-छांट कर आकर्षक व पठनीय बना सके। लेकिन स्तरीय पत्र-पत्रिकाएं ऐसी रचनाओं दो-चार लाइन पढ़कर ही घूड़े के हवाले कर देती हैं।
छोटी पत्र-पत्रिकाओं में छपी हुई रचना को जब पाठक पढ़ता है, तब उसकी गलतियों को देखकर उसके नौसिखिएपन का आभास होता है। पाठक रचना को देखकर हंसता है, चिढ़ता है, कूढ़ता है। इससे किसी और की नहीं, लेखक की छवि धूमिल होती है।
फिर पाठक दुबारा उसकी अन्य रचनाओं को पढ़ना तो दूर, देखना भी गंवारा नहीं करता। कारण कि उसे उसकी रचनाओं में कोई रस, कोई आनंद, कोई तृप्ति, कोई मनरंजन की अनुभूति नहीं होती।
एक संपादक की नजर से रचना का संशोधन भाषा, भाव या अर्थ-संबंधी हो सकता है। इसके लिए यदि शब्दकोश, व्याकरण की किताब देखनी पड़े, तो निःसंकोच देखा जाना चाहिए और अपने लिखे हुए को व्याकरण के नियमों के तहत जांचना चाहिए कि वह सही लिखा गया है या नहीं। इसमें कोताही बरतना मतलब अपने पांव पर आप कुल्हाड़ी मारना है।
इसी तरह भाव व अर्थ पर भी ध्यान देना चाहिए। इसमें जरा भी संदेह हो, तो उस रचना को भेजने के लालच से अपने-आप को सख्ती से रोक देना चाहिए और रचना में भावाभिव्यक्ति समाहित करना चाहिए।
रचना को संपादक की नजर से देखने का आशय यह भी कि जैसे मूर्तिकार मूर्ति को ग्राहक, अभिनेता अपने अभिनय को दर्शक, खिलाड़ी अपने खेल को कोच, गायक व वादक अपने सुर-ताल को श्रोता की नजर से देखकर अपने कौशल में सुधार करता है, उसी तरह अच्छा लेखक बनने के लिए लेखक को अपनी रचनाओं को पाठक की नजर से देखकर अपने हुनर में निरंतर निखार लाते रहना चाहिए।
कहा तो यहां तक जाता है कि संपादक एक कसाई भी होता है। वह रचनाकारों की रचनाओं को कांट-छांटकर उपयोगी अंगों को संवारता है और अनुपयोगी अंगों को रचना से निकाल देता है, उसी तरह लेखक को भी अपनी रचनाओं में दृष्टि डालनी चाहिए, तभी उसकी रचनाएं परिष्कृत व परिमार्जित होकर सराहनीय बन पड़ेगी।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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