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लेखन की चुनौतीः भाग-11 हिंदी की बिंदी-वीरेंद्र देवांगना

लेखन की चुनौतीः भाग-11
हिंदी की बिंदी
हिंदी की प्राण है बिंदी। इसे हिंदी भाषा में अनुस्वार कहा जाता है। हिंदी भाषा में जरा-सी बिंदी ( ं ) की महत्ता इतनी अधिक है कि यह शब्दों का अर्थ ही बदलकर रख देता है।
‘चिता’ और ‘चिंता’ को लिजिए। ‘चिता’ का अर्थ शव जलाने की लकड़ी, कंडा या विधुत तरंग है, जिससे शव को अग्नि के सुपुर्द किया जाता है, लेकिन ‘चिंता’ फिक्र के अर्थ में किसी विषय पर ध्यान देने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
इसी तरह ‘परसो’ और ‘परसों’ में बिंदी से विशेष भेद हो गया है। जब किसी को खाना खिलाया जाता है, तब खाना परोसना कहा जाता है। जैसे-अब, भोजन ‘परसो’ भी; कब तक बनाते रहोगे?
इसके विपरीत, आनेवाले कल के बाद वाले दिन या बीते कल के पहले वाले दिन को ‘परसों’ कहा जाता है।
अब, बहने और बहनें को भी समझिए। पानी या हवा या लहर या अंधड़ को ‘बहने’ दो, कहा जाता है। लेकिन ‘बहनें’ का प्रयोग बहन के बहुवचन के रूप में होता है। जैसे-उसकी दो ‘बहनें’ थीं।
इसी प्रकार ‘देहात और देहांत’ का अंतर ज्ञात ही होगा। ग्रामीण क्षेत्र को ‘देहात’ कहा जाता है, तो मृत्यु या मौत को ‘देहांत’
ऐसा ही अंतर ‘सास’ और ‘सांस’, ‘वश’ और ‘वंश’ आदि में भी है।
सवाल यह भी कि अंकीय अक्षर ‘दोनो या तीनो’ लिखें या ‘दोनों या तीनों’। हम बोलते समय तो अंक के अक्षरों को सही बोल जाते हैं, लेकिन पढ़ने की कमी और उससे अधिक अक्षरों व शब्दों पर ध्यान कंेद्रित न कर सकने की दुविधा की वजह से गलत लिख डालते हैं।
इसका तार्किक जवाब यही कि जब हम चारों, पांचों, छहों, सातों, आठों, नौवों और दसों लिखते और बोलते हैं, तो दोनों व तीनों लिखने में कोई असमंजसता नहीं होना चाहिए।
हिंदी में अनुस्वार वाले अन्य शब्द हैंः-मैं, में, मैंने, हैं, वहीं, क्यों, क्योंकि, इन्हें, उन्हें, पांेछा, मेंढक, भौंरा, परछाईं, ईंट, पर्वतों, पहाड़ों, नदियों, सागरों, महासागरों, तालाबों, कुंओं, समुद्रांे, पवनें, लहरें, द्वीपों, महाद्वीपों, नालों, नालियांे, भवनों, मकानों, नगरों, खंडहरों, भाइयों, बहनों, पाठकों, श्रोताओं, दर्शकों, मित्रों, दोस्तों, महिलाओं, नारियों, पुरुषों, मानवों, मनुष्यों, महीनों, दिनों, दैनिकों, साप्ताहिकों, मासिकों आदि हजारों ऐसे शब्द हैं, जिसमें अनुस्वार लगते हैं।
इसमें स्मरण यह भी रखना चाहिए कि जब संबोधन किया जाएगा, तब बिंदी (अनुस्वार) का प्रयोग नहीं किया जाएगा। उदाहरणस्वरूपः-प्रिय पाठको, प्रिय लेखको, प्रिय रचनाकारो, प्यारे भाइयो व बहनो, मेरे परमप्रिय मित्रो, सुनो साथियो, आदरणीय गुरुओ, माननीय गुरुजियो, सम्मानीय नेताओ आदि कहा जाएगा।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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