Notification

मन या अंतःकरण-वीरेंद्र देवांगना

मन या अंतःकरण::
मन की परिभाषा शब्दकोश में इस प्रकार दी गई हैः-प्राणियों में वह शक्ति, जिसमें अनुभव, संकल्प-विकल्प, इच्छा, विचार आदि होते हैं। अर्थात अंतःकरण की वह वृत्ति, जिसमें संकल्प-विकल्प होता है। इसे हम इच्छा, इरादा और विचार भी कह सकते हैं।
तीसरे, हमारे अंतस में इनसे भी महाबलशाली एक और तत्व विराजमान है, जिसे हम जान, रूह, प्राण या आत्मा कहते हैं। असल में, ये है, तो हम हैं; वरना हमारी कोई हस्ती नहीं है। यह जब तक हममें मौजूद है, तब तक इस धरा में हमारा वजूद हैं,
ऊपर से यह अमर है। इसके द्वारा शरीर छोड़ देने से बेचारा शरीर निष्प्राण हो जाता है। फिर हम इसे खाक-ए-सुपुर्द, दफन, दाह-संस्कार या पंचतत्व में विलीन कर देते हैं।
अर्थात् जो आत्मा हमें दिखता नहीं, जिसका हमें ख्याल रहता नहीं, जिसका साज-संभाल हमने किया नहीं, अंततः वही हम हैं।
उपर्युक्त विश्लेषण से तीन तथ्य उभरकर सामने आए हैं। तन, मन और जान। जो सन्यासी कंदराओं और गुफाओं में परमात्मा की प्राप्ति के लिए धुनी रमाए रहते हैं, वे जानते हैं कि आत्मा का परमात्मा से मिलन विरानियों में होगा। इसलिए वे निर्जन स्थान को इसके लिए मुफीद मानते हैं। वहीं अपना डेरा जमाते हैं। सच्चे संन्यासी सांसारिक माया-मोह से दूर रहते हैं। परमात्मा को पाना ही उनका एकमेव लक्ष्य रहता है।
इसलिए यह तथ्य गांठ बांध लेना चाहिए कि जो संत या महंत माया-मोह में फंसा रहता है, संासारिक जाल में उलझा रहता है, वह परमात्मा का सच्चा भक्त हो नहीं सकता। वह केवल ढोंगी व पाखंडी हो सकता है, पर अल्ला-ताला का नेक बंदा नहीं। हालिया बलात्कार और अन्य अपराध में जेल की हवा खा रहे बाबाओं के धन-दौलत व एशोइशरत पर नजर डालते हैं, तो इसकी सत्यता का गहरे तक भान होता चला जाता है।
इनके विपरीत, जो लोग संसारी हैं, सामाजिक प्राणी हैं, वे मन और तन को साधकर व्यक्तित्व का विकास करते रहते हैं। वास्तविकता यही कि तन, मन और जान में उचित सामंजस्य और तालमेल बिठाने का काम ही ‘व्यक्तित्व का विकास’ कहलाता है। इसकी झलक प्राणीमात्र से स्नेह करने से लेकर व्यक्ति के बोलने𝔠ाने, उठने-बैठने, चलने-फिरने, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, जिम्मेदारी निभाने, समस्या सुलझाने, दिक्कतों का सामना करने में नजर आता है। इसी से पता चलता है कि उसके तन, मन और जान में तादात्म्य है या नहीं।
मेरा मंतव्य आप तक पहुंच रहा है या नहीं? यदि पहंुंच रहा है, तो हम सही दिशा में हैं।…और नहीं पहुंच रहा है, तो क्यों नहीं पहुंच रहा है; एक दृष्टांत से स्पष्ट हो जाएगा।
एक डाक्टर था, जो शराबनोशी से होनेवाली हानि के बारे में लोगों को बता रहा था। उसने कांच के दो गिलास लिए। एक में साफ पानी भरा, दूसरे में शराब। फिर दोनों गिलास में एक-एक केंचुआ छोड़ दिया। पानी भरे गिलास में केंचुआ तो मजे से तैरने लगा, पर शराब भरे गिलाब में वह छटपटाकर मर गया। डाक्टर ने मौजूद शराबियों से पूछा,‘‘इससे क्या सिद्ध होता है?’’
एक ने झट जवाब दिया,‘‘शराब पीने से पेेट के कीड़े मर जाते हैं।’’
डाक्टर सोच में पड़ गया कि क्या वह इस प्रयोग के माध्यम से यही संदेश देना चाहता था?
दरअसल, हम वही देखना और सुनना चाहते हैं, जो हमारा मस्तिष्क चाहता है। न कि वह, जो हमें बताया जा रहा है। यह इंसानी फितरत है। इसे तंग दिमागी भी कहते हैं। हमें अपने हित में इसी तंग दिमाग को खोलने की जरूरत है।
–00–

Leave a Comment

Connect with



Join Us on WhatsApp