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हैं बनी – मुनमुन सिंह

मेरी जिन्दगी न जाने किस सीसे टूकड़े से हैं बनी ।
रहती हूँ मै हमेशा बीमार
बचपन से सोचती I. A.Sबनते हैं कौन ।
कविता लिखी जाती हैं कैसे ।
मैं अपना लक्ष्य भी बना ली इसी को।
मेरी जिन्दगी न जाने किस सीसे टूकड़े से हैं बनी ।
आज मैं आर्ट ले ली अपने लक्ष्य के वास्ते ।
घर वाले भी बोले इस बात पर व्यंग्य ।
करना चाहते नहीं कोई इस में मेरी सहायता ।
लोग कहते हैं गणित और जीव विज्ञान लेकर पढ़ाई करो ।
मेरी जिन्दगी न जाने किस सीसे टूकड़े से हैं बनी ।
साथियों कर दो इसमें मेरी सहायता ।
हासिल कर लू मैं अपना लक्ष्य ।
मन कहता हैं में हो जाऊ खत्म ।
दिल कहता हैं नाम कर दूँ इस ज़हा में ।
मेरी जिन्दगी न जाने किस सीसे टूकड़े से हैं बनी ।

—मुनमुन सिंह

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Ravi Kumar

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

2 thoughts on “हैं बनी – मुनमुन सिंह”

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