“नए शहर की पहली रात” – अमित रजक

“नए शहर की पहली रात” – अमित रजक

15 मई 2017 को घर से पहली दफा जबलपुर शहर रहने को आया था।अपने कमरे में पहली दफा ख़ुदको अकेला पाया था।खुद का बना बेस्वाद खाना और सब कुछ खुद सम्भालना बहुत ही कष्टदायक था।सुबह 6 बजे उठकर पानी भरना कभी कभी तो स्मरण ही नही रहता था।फिर दिन भर पीने के पानी की किल्लत।
अक्सर घर में 12-14 रोटियां चटकारे लेकर खाने वाला अमित आज कुछ भावुक था, ये सोचकर के माँ 6 लोगों के परिवार को सहजता से भर पेट खाना खिलाती है सुबह,शाम कभी कभार रिस्तेदारों को दोपहर में भी।आँख से आँशु बहने लगे,तुरंत मां को फोन लगाकर सारी व्यथा सुनाई माँ ने हस के कहा पागल कही का ऐसा मत सोचो हर माँ ऐसा ही करती है।आज माँ की ममता असल जिंदगी में देखी थी,दिल भर आया था।
एक महीने बाद जब माँ मेरे किराये के घर आई पूरे कक्ष को घर की तरह पहले तो साफ किया फिर स्वादिस्ट भोजन बना दिया और खिला के 2 घण्टे बाद घर चली गई।
यकीन मानिए वो दिन,दिन भर आंख से आँशु बहते रहे और लड़की की बिदाई के बाद उसके रोने के ढोंग वाली कड़वी सच्चाई समझ आ गई।मेरे जीवन मे इस दिन के बाद हर लड़की एवम औरत जात के लिए आसमान से भी ऊंची इज्जत बढ़ गई।

—अमित रजक

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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