रेखा – निशा निक

रेखा – निशा निक

हम भारतियो की एक अकथित कथा और व्यथा दोनो ही है,हम लोग बहुत आशा वादी होते है
खास तौर से भारतिय समाज का वह तबका जो अपने बदहाल जीवन से परेशान है
जो अमीर वर्ग और सरकार की नितियो से ताङित है…
इसी कङी में मैं भारत के एक ऐसे ही वर्ग को आपके सामने रखना चाहती हूँ..
हालाकि अभी तक आप समझ चुके होंगे की मैं किस वर्ग की बात कर रही हूँ…
जी मैं किसान वर्ग की बात कर रही जो आजादी के 70सालो के बाद भी अपने घरो में रात के अंधेरे में खुद से ही छुपकर भूख से रो कर सोते है…
खाना तो वो खाते पर..तीनो वक्त का खाना उन्हे नसीब होगा की नही वो नही जानते…
क्या पूरे साल उनका पेट भरेगा की नही वो ये भी नही जानते…
उनकी थाली में दाल और सब्जि एक साथ सजाना बस एक सपना मात्र है…
जो कभी पूरा होगा की नही, वो नही जानते..
बस हर बार बदलती सरकार के साथ कुछ और नए वादो को अपनी आंखो में जगहा दे देते है…
मैं नही कहती सरकार ने कुछ नही किया इन किसानो के लिए…किया है…और बहुत अच्छे से किया है…उनकी बदहाल जिन्दगी को और भी बदहाल करने का काम किया है..
मैं किसी पर आरोप-प्रतयारोप नही लगा रही हूँ…
बस हमारी सरकार शहर की चकाचौंध में और अपनी भोगविलासता में ये भूल चूकी है की भारत गांवो का देश और इसकी धङकन गांवो की माटी के किसानो में धङकता है…ज्यादा तर नेता पथभ्रष्ट हो कर उसी धङकन पर चोट कर उसे चोटील कर रहे है…घायल तो आजादी पहले ही थी अब उस पर मरहम करने की बजाये उसे और चोटील कर रहे है…
इतना सब होने के बाद भी जब सब ठीक नही हो रहा तो मजबूर को यही कह के जीना पङता है सब नसीबो का खेल है…
जब हाथो की रेखा में ही भूखे रहना लिखा हो तो कोई सरकार क्या कर सकता है..
अब क्या कहे उन मासूम किसानो से जब हमारे समाज के पढे-लिखे वर्ग को समझ नही आता की ये कमी हाथो की रेखा की है या सरकार
की ।

—निशा निक

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