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समाज:बेटी-Study-KSF

समाज कौन है? समाज कैसा है? कहाँ रहता है ;समाज? मेरे इन सवालों के जवाब कौन दे;जिससे पूछूँ वही बेवकूफ समझेगा|स्कूल की किताबों में यही पढ़ाया गया, हम सब से मिलकर समाज बना है| विभिन्न समुदायों का मिलजुल कर साथ रहना ही समाज है|इस तरह तो समझ में नहीं आयेगा ;यदि विभिन्न समुदायों का मिलजुल कर रहना ही समाज है;तो फिर यह एक विशाल परिवार की तरह है|जिसमें सभी सदस्यों को आपसी तालमेल के साथ रहना चाहिए|भरपूर स्नेह मिलना चाहिए|
ख़ैर थोड़ा सा दिमाग है मेरा समझ नहीं पाता है बेचारा|आधुनिक युग में हर तरफ जीवन जीने की सहूलियतें हैं|घर में जितने भी सदस्य हो सब आमदनी का ज़रिया बन रहे हैं ;क्योंकि खर्चे ही इतने बढ़ गये हैं|आज प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह उच्च वर्ग हो,चाहे निम्न वर्ग हो या मध्यमवर्गीय;मध्यमवर्गीय तो हमेशा से पिसा है और आज भी पिसता है|हर व्यक्ति को बच्चों को, बूढ़ों को, जवानों को, बेटा हो या बेटी मोबाइल की आवश्यकता है, इतना ही नहीं फैशन के वस्त्र, जूता-चप्पल हर चीज़ नये ज़माने के फैशन के हिसाब से होना चाहिए|फैशन की इस होड़ में हम अपने मान, आदर्श और परम्पराओं को बहुत पीछे छोड़ आये हैं|
ख़ैर इन सब बातों को छोड़ो, दरअसल मैं बात करना चाहती हूँ आज के समाज की और समाज में लोगों की|एक समय था जब लोगों में शिक्षा का अभाव था स्त्रियों की शिक्षा पर कोई विशेष ध्यान नहीं था|शादी के बाद सास को बहु से यही आश रहती , कि कब पोता होगा|बहु के हमले होते ही सा, फूले न समाती|पूरा परिवार ख़ुशी में निहाल होकर इन्तज़ार करता उस दिन का, जब उनके आंगन में पोते की किलकारियां गूंजेगी|जैसे ही कानों में आवाज़ पड़ती|”पोता भयो है|” मारे ख़ुशी के पांव न पड़ते|पटाखे जलाये जाते, मिठाई बांटी जाती, दावतें होतीं|पटाखों के लगने पर लगता मानों कान दगा रहें हों|अगर पोती होती तो बेचारी मारी जाती या तो ठुकराई सी ज़िन्दगी जीती|पालने में पड़ी बिलखती रहती और माँ घर का सब काम कर रही होती, और कोई उस बच्ची को न पुचकारता|हाँ स्नेह मिलता तो बस वहाँ जिनके कई पीढ़ियों से लड़की न हुई हो|
आज के समय में शिक्षा में विस्तार होने से प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा के प्रति सचेत है, लड़कियां भी पढ़-लिख कर ऊंचे पदों पर कार्यरत हैं|माँ-बाप का सहारा बन रहीं हैं, परन्तु आज भी समाज उन्हें स्नेह की दृष्टि से नहीं देखता|हाँ देखता है तो उनका पद और रुपया|आज भी जब किसी घर में लड़के का जन्म हो तो वही पटाखों की गूँज सुनाई देती है, वही बंधाई, वही ख़ुशी|लेकिन पोती का नाम सुनते ही सास, नन्द आदि का मुंह सूख जाता है|परन्तु झूठी शान और ख़ुशी का इज़हार करके झूठा स्नेह जताया जाता है|…… “अरे! तो क्या हुआ लड़की हुई है बस उसका नसीब अच्छा होऔर क्या|” उसे नसीब के पालने में पहले ही झुला दिया जाता है|करें भी क्या बहु पढ़ी -लिखी है और लोग भी कहेंगे पोती के नाम से जल गयीं हैं|वैसे भी सरकार कहती है “बेटा-बेटी एक समान|बेटी के नाम पर पैसा भी मिल जाता है, तो अब कहेंगी ही” क्या हुआ लड़की हुई है, लड़की क्या किसी से कम हैं, पढ़ा -लिखा लो बुढ़ापे में लड़कियां ही साथ देता है|”लड़की होना तो पाप नहीं लड़की का जीवन कठिन होता है|जन्म से लेकर जीवन भर उसूलों और सलीकों की रस्सियाँ पकड़कर जिन्दगी की सीढ़ियों पर चढ़ना होता है|ग़र क़दम लड़खडाए तो ख़ुद ही संभलना होता है|
पैदा होते ही नसीब के जुम्लें, जब तक चलने वाले हुए तो कुछ अच्छाईयां मगर उसमें भी नसीब जुड़ा रहता|पढ़ाई तो करवाई जाती मगर ताना नसीब का, अच्छे वर का|चौका-बर्तन के साथ सिलाई- कढ़ाई, साज-सलीका सब सीखो|कभी रोटियाँ जल जाये तो ताना…. “जली रोटियां सास के घर जायेगी ऐसे पायेगा तो मार खायेगी|” अच्छा घर मिल गया तो ठीक वरना तो बहुत मुश्किल है|ये ऐसे किया, वो वैसे किया सारा समय इन्हीं नोक -झोक में गुज़रता चला जाता है और पता ही नहीं चलता कि कब घर के दरवाजे पर मेहमान बेटी का रिश्ता लेकर आ गये|तब पता चलता है बेटी इतनी जल्दी जवान हो गयी, पता ही नहीं चला|बेचारी बेटी फिर चुपचाप सबकुछ सहती, अभी- अभी थोड़ा कुछ सीख पायी थी कि शादी हो गयी|नया घर, नया परिवार, सब कुछ नया जिन्दगी फिर नये सिरे से शुरू हो गयी|नये- नये में तो बहुत प्यार, सम्मान मिला;फिर धीरे- धीरे कम होता गया|अब तो हर रोज़ ताने, मुश्किल, झगड़े, दहेज के ताने…. ये नहीं मिला, वो नहीं मिला|जो अपना हमसफर वो तक लालची|बेटी तो माँ- बाप के सर पर बोझ की तरह थी|
दुनिया में इतनी चीज़ें दान की जाती हैं फिर भी शायद कमी थी तो ख़ुदा ने लड़की बनाई लो इसे भी दान करो|”बेटी दान की वस्तु है “दान में मिली वस्तु का जैसे चाहो उपयोग करो, जितने दिन चाहो उपयोग करो|लड़की महज़ इस्तेमाल की वस्तु है फिर उसे खिलौने या पुराने कबाड़ की तरह किनारे कर दो|सच ही है स्त्री से ज़्यादा कोई सहनशील नहीं, देखो इतना सब कैसे सह गयी|दूसरों के लिए ख़ुद को मिटा दिया|दूसरों को अपना बनाते- बनाते ख़ुद को भूल गयी|कभी- कभी सोचती हूँ तो लगता है लड़की एक वस्त्र की तरह है जिसे पहनकर उतार दिया जाता है और पटक – पटककर धुलवा या जाता है फिर पहनकर उतार दिया जाता है, फट जाये तो फेंक दिया जाता है|कपड़े तो फिर भी सलीके से पहने जाते हैं लेकिन लड़की को जल्दी फेंकने का मन होता है|मुझे तो ऐसे लोग वहशी भेड़िये ही लगते हैं, लगते नहीं होते ही हैं|
इतना कुछ जानने के बाद मेरी समझ में यह नहीं आया इसमें लड़की का दोष कहाँ था? क्यों उसे ये सज़ा दी जाती है|जिससे यह संसार है, जिससे इस संसार में स्नेह, ममता और प्यार है;उसी से इतनी नफरत क्यों? लड़की तो एक ऐसा फूल है जिसे जितना स्नेह और प्यार से सींचोगे उतना ज्यादा सबको स्नेह व प्यार मिलेगा| ममता के रूप में, हमसफर के रूप में, हमराज़ के रूप में, बेटी के रूप में, दोस्त के रूप में, कई रूप हैं इसके|खिलकर प्यार की ख़ुशबू बिखेरेंगा|
मैं फिर सवाल करतीं हूँ, समाज किधर गया? समाज में ही हम सब किसी की बेटी, बेटा, सास, बहु, नन्द आदि बनते हैं फिर हम सब एक दूसरे से ऐसा घृणित व्यवहार क्यों करते हैं? क्यों किसी की बेटी की मान-मर्यादा उछालते? क्यों उसे नफरत की आग में झोंक देते हैं? वो हम सब की बहु, बेटी, माँ है|ख़ुद को बदलो, रीति- रिवाज़ों को बदलो|समाज कोई दानव नहीं हम आप हैं|खु़द से पहले पहल करो तो कोई दुश्मन नज़र नहीं आयेगा|प्रत्येक परिवार में आपसी तालमेल, स्नेह एवं प्रेम होगा,;तो सारा समाज सुखी एवं सम्पन्न होगा|सुन इधर बैठ समाज तू ख़ुद को ढूंढ रहा था और मैं तुझे ढूंढ रही थी, अच्छा हुआ यहीं मिल गया;कान खोलकर सुन ले, आज से तू सुधर जा तो तरक्की करता जायेगा;वरना यूँ ही गड्ढे में गिरता जायेगा| दूसरों को ग़लत कहता है वो तू ही है ध्यान दे|तू ख़ुद को ग़लत कहता है|
मैंने समाज को समझा दिया और आशा है समाज भी अपने सदस्यों को समझायेगा|
……….. लेखिका – कौसर जहाँ ‘नूरी’ ग्राम- धिरावां, गोला-खीरी

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