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मुखिया को मुख-सा होना चाहिए-वीरेंद्र देवांगना

मुखिया को मुख-सा होना चाहिए::
मुखिया को मुख के समान होना चाहिए। खाता मुंह है, लेकिन जो ऊर्जा बनती है, वह अपने पास नहीं रखता। वह हाथ-पैर को देता है, नाक-कान को देता है, पेट-पीठ को देता है, टखने-घुटने को देता है, तन-मन को देता है; यहां तक कि वह खाया-पीया रोम-रोम को देता है।
इसलिए घर के मुखिया को चाहिए कि वह अपनी संतानों में भेदभाव न करे। सबको समान महत्व दे। सबको समान स्नेह करे। यदि मुखिया यह कर लिया, तो समझिए उसका बुढ़ापा ठीक से कट गया।
इसके विपरीत यदि उसने अपनी संतानों में विभेद करना चालू कर दिया, तो समझो, उसका बुढ़ापा कष्टकारी हो सकता है। फिर चाहे औलाद लड़का हो या लड़की। मुखिया को सबके प्रति समान दृष्टि रखनी चाहिए।
कारण कि यह जरूरी नहीं कि जिस औलाद के प्रति आपका स्नेह ज्यादा है, उसका स्नेह व आदर भी आपके प्रति उतना ही रहेगा। वह परिस्थिति के अनुसार बदल भी सकता है। तब मुखिया को उसके साथ रहना पड़ सकता है, जिसके साथ उसने अन्याय किया है। ऐसी सूरत में मुखिया का जीना दुश्वार होने में देर नहीं लगेगी।
आजकल, बड़े-बूढ़ों के साथ जो अत्याचार हो रहा है, उन्हें आश्रमों में छोड़ा जा रहा है, उसके पीछे खुद उसका भेदभावपूर्ण रवैया भी दोषदार है।
मुख अगर सारी ऊर्जा अपने पास रख लेता, तो वह राक्षस के मुंह जैसे हो जाता और बाकी अंग कमजोर हो जाते।
माना कि आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए, किंतु, वह किसी का शोषण करके हासिल करे, लूटपाट करके हासिल करे, हकमार कर हासिल करे, तो उसे आत्मिक सुख व शांति नहीं मिल सकती।
इसलिए, मुख के समान बनना चाहिए। खुशियां ढूंढना चाहिए और सबमें समान रूप से बांटना चाहिए। इसी से आपको सुख-चैन की प्राप्ति होगी। तभी कहा गया हैः-
मुखिया मुख सो चाहिए, खान-पान कहुं एक।
पालइ-पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक।।
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