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प्राण या जान-वीरेंद्र देवांगना

प्राण या जान::
प्राण हम जीव व आत्मा भी कहते हैं। आपने खास अवसरों पर लोगों को कहते सुना होगा कि जान है, तो जहान है। जान है, तो हम हैं, अन्यथा हमारी कोई बिसात क्या है? दरअसल, जहां जान है, वहीं जहान भी है।
आपने अनेक अवसरों पर यह भी सुना होगा कि मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग अंतर्रात्मा की आवाज से किया है। जब दो समान परिस्थिति में किसी एक का चुनाव करना होता है, तब अंतर्रात्मा की आवाज ही हमें सही रास्ता सुझाती है। संकट की घड़ी में यही हमारा पथ-प्रदर्शन करती है।
वस्तुतः यही हमराही है। यह हमें हमेशा जागरूक करती है कि क्या उचित है और क्या अनुचित? बुरे और भले का ज्ञान भी यही कराती है। नेकी और बदी भी यही बताती है। यहां तक कि मुसीबतों, कठिनाइयों, बाधाओं और परेशानियों के दौरान भी यह हमारा दिग्दर्शन करती रहती है।
लिहाजा, अंतर्रात्मा की आवाज सुनकर सही कदम उठानेवालों की काबिलियत बढ़ती जाती है। वे उन्नति का सोपान तय करते चले जाते हैं। इसके विपरीत, अनसुना करनेवालों की नाकाबिलियत बढ़ती चली जाती है और वे अवनति को प्राप्त होते जाते हैं।
झूठ बोलना, चोरी करना, डाका डालना, अपराध व पाप को अंजाम देना, नशाखोरी करना, धोखा देना इत्यादि ऐसे ही कृत्य हैं, जिन्हें करते समय आत्मा हमें रोकती-टोकती है कि रुक जा, इसे मत कर। फंस जाएगा, उलझ जाएगा, बरबाद हो जाएगा।
मगर हम हैं कि उस आत्मिक शक्ति की चेतावनी को नजरअंदाज कर दुःख, कष्ट, तकलीफ व मुसीबत झेलते रहते हैं। फिर यह आदत बन जाती है और हम आदतन अपराधी बन जाते हैं। तब तक हमारी आत्मा का बेड़ा गर्क हो चुका रहता है। उसका पुनः लौ में आना मुश्किल हो जाता है। इसे ही हम जमीर का मर जाना भी कहते हैं।
हमें अपने व्यक्तित्व को विकसित करना है, तो दिल की आवाज को सुनना पड़ेेगा। उसे नैतिकता का खुराक देना पड़ेगा; सत्कर्म में लगाना पड़ेगा। उसे अच्छे कार्यों में लगाकर व्यस्त रखना होगा।
उसका उपयोग मानवहित में और प्रकृतिहित में करना होगा। उसे प्राणीमात्र के प्रति दया, करुणा, स्नेह, सहानुभूति, संवेदना, आशा व अभिलाषा के स्वर्णिम अनुभूतियों से रूबरू कराना होगा।
इसके लिए सत्साहित्य का अध्ययन करना, सकारात्मक विचारधारा वाले शख्सियतों से मेलजोल रखना व चर्चा करना, बडों का आदर करना, छोटों के साथ स्नेह रखना, हमउम्रों से समानुभूति रखना, देश के संविधान सहित शासकीय नियमों और कायदे-कानूनों का न केवल स्वयं पालन करना होता है, अपितु दूसरोें को भी इसके लिए प्रेरित करना होता है।
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