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मंजिलें -पूनम मिश्रा

अनजान न थे मंजिलों से हम बस तूफानों का सामना करते थे हम
एक तरफ मेरी उम्मीदें थी तो एक तरफ मेरा अभिमान था
मंजिलें और सपनों के बीच जंग तो जायज है

क्योंकि एक तरफ मेरे अपने थे एक तरफ मेरा प्यार था

पूनम मिश्रा

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