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**मानवता**-चिंता-नेताम

         ना थल में,ना नभ में ,
         ना जल में,ना पाषाण में,
         मानवता ही एक ऐसा श्रृंगार,
         मात्र मानव मन में ।
         मानव यदि सीख ले इसे,
         धारण करना अपने जीवन में, 
         प्रकृति की सुंदरता से भी सुंदर,
         कोई नहीं है इसके सामने ।।

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