Notification

सफलता की कुंजी है आत्म-विश्वास-वीरेंद्र देवांगना

सफलता की कुंजी है आत्म-विश्वास::
यह सच है कि आत्म-विश्वास के बिना सफलता हासिल नहीं की जा सकती। आत्म-विश्वास सफलता की कुंजी है। इसके बगैर सफलता की कामना, बेकार है।
ये दोनों, अर्थात-सफलता और आत्म-विश्वास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि आपमें आत्म-विश्वास है, तो आप कामयाबी की ओर अग्रसर हैं और यदि आपने कामयाबी हासिल की है, तो आप आत्म-विश्वास से ओत-प्रोत है।
यह असंभव है कि आप आत्म-विश्वासी तो हैं, पर कामयाब नहीं हैं। यदि आप कामयाब हैं, तो निश्चित जानिए कि आपमें आत्म-विश्वास की कोई कमी नहीं है। दोनों में चोली-दामन का साथ है। दोनों परस्पर आश्रित हैं।
एक विश्व-विद्यालय के लगभग दो हजार छात्र-छात्राओं का सर्वेक्षण किया गया, तो पता चला कि उनमें-से पंद्रह सौ विद्यार्थियों में आत्म-विश्वास का बेहद अभाव था। वे न केवल पढ़ाई-लिखाई में कमजोर थे, अपितु जीवन के प्रति उनकी विचारधारा भी कमजोेर और लुंज-पुंज थी।
इस सर्वे के ठीक एक वर्ष बाद, जब पुनः उनकी पड़ताल की गई, तब भी उनमें कोई खास परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ। वे पहले की ही तरह आत्म-विश्वासहीन नजर आए। असल में, वे किसी-न-किसी बात को लेकर हीन-भावना से ग्रस्त थे।
कोई मुफलिसी व अभावग्रस्तता को लेकर, कोई कद-काठी को लेकर, कोई चेहरा-मोहरा को लेकर, कोई रंग-रूप को लेकर, कोई योग्यता को लेकर, कोई असफलता को लेकर, तो कोई पारिवारिक व सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर हीन-भावनाएं पाले हुए थे।
इसके पश्चात, जब जीवन समर में इनकी सफलता-असफलता के दर का आंकलन किया गया, तब भी कोई खास अंतर नजर नहीं आया। इनमें-से ज्यादातर यानी तकरीबन पचहत्तर फीसदी आत्म-विश्वासहीनता की वजह से या तो साधारण काम-धंधों में लग गए थे या फिर असफलता की राह पर थे।
वे अंदर से डरे हुए, दुबके हुए, असुरक्षित, शक्तिहीन, अविश्वासी, नाकाबिल और गैर-जिम्मेदार दिखाई दे रहे थे। उन्हें देखकर लगता ही नहीं था कि वे कालेजों में पढ़े हैं और आत्म-विश्वास से भरे हैं।
जब महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़े-लिखे युवाओं का ये हाल है, तब स्कूली शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों या अनपढ़-गंवारों के आत्म-विश्वास की दशा कैसी होगी; इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है? इनकी भी स्थिति कमोवेश ऐसी ही होगी और कहीं-कहीं तो बदतर भी होगी।
आपको हर जगह ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो आत्म-विश्वास के अभाव की वजह से पराजित-से, भयभीत-से, घुटनों के बल रेंगते हुए मिलेंगे। जो न केवल कुंठाग्रस्त, दीन-हीन, असमर्थ दिखेंगे, अपितु समाज में आत्म-विश्वासहीनता का विष धोलते मिलेंगे।
झूठी शान दिखानेवाले, शेखी बघारनेवाले, बड़े बोल बोलनेवाले, नशाखोरी करनेवाले, जुआं खेलनेवाले या गुमसुम व चुप्पा रहनेवाले, चुगली करनेवाले, शिकायत करनेवाले-आपको हर जगह मिल जाएंगे, जो आत्मविश्वासहीनता के जीते-जागते मिसाल होंगे।
दरअसल, ऐसे लोग अपने ‘अति’ या ‘अल्प’ को इन्हीें माध्यमों से प्रदर्शित करके समाज का ध्यान अपनी ओर खिंचते करते रहते हैं, जो उनकी मृग मरीचिका होती है।
–00–

Leave a Comment

Connect with



Join Us on WhatsApp