Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

व्यक्तित्व विकास के फायदे-1-वीरेंद्र देवांगना

व्यक्तित्व विकास के फायदे-1
आप किस पेशे में हैं। डाक्टर हैं, वकील हैं, इंजीनियर हैं, लेखाधिकारी हैं, चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, शासकीय-अशासकीय अधिकारी-कर्मचारी हैं, व्यापारी हैं, उद्यमी हैं, विद्यार्थी हैं, शिक्षक हैं, लेखक हैं, तो आपको अपने व्यक्तित्व के विकास की जरूरत है।
इसके माध्यम से आप अपने पेशे में आमूलचूल परिवर्तन ला सकते हंै। उसमें चार चांद लगा सकते हैं। अपने कार्य को स्थायीत्व प्रदान कर सकते हैं। उसे बुलंदियों पर ले जा सकते हैं।
उदाहरणार्थ, गर आप बेरोजगार हैं, नौकरी के लिए चप्पलें धिस रहे हैं, तो आप अपने व्यक्तित्व का विकास करके सबको प्रभावित कर सकते हैं। इंटरव्यू को धांसू तरीके से दे सकते हैं। बढ़िया से बढ़िया जाब हासिल कर सकते हैं।
यकीनन, इससे आपका आत्मविश्वास कई गुणा बढ़ सकता है। आप सफलता की ऊंचाइयों को छू सकते हैं। कारण कि व्यक्तित्व ही आपकी छवि का संचालक होता है।
लोग आपके बारे में क्या धारणा बनाते हैं, यह आपके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं जैसे वाणी, चाल-चलन, और व्यवहार के तौर-तरीकों पर निर्भर करता है।
तात्पर्य यह कि व्यक्तित्व के विकास की जरूरत सभी को है। हम महज एक व्यक्ति नहीं, एक व्यक्तित्व हैं। क्या हमें अपने अंदर मौजूद व्यक्तित्व को जानने की आवश्यकता नहीं है? हां है।…और बेजा है।
जो हम हैं; वो हम नहीं हैं। जो हम नहीं हैं; वही हम हैं।
उक्त अल्फाज पढ़ने-सुनने में लगता है कि मजाकिये अंदाज में कहा गया कोई ऊटपटांग कथन है। परंतु, गहराई से गौर फरमाने पर मालूम होता है कि इन वाक्यों में व्यक्तित्व के विकास को समझने का गहरा तत्व छिपा हुआ है।
हम अपने-आप पर निगाह डालें, तो पाएंगे कि हम केवल शरीर नहीं हैं। हमारे पास दो हाथ, दो पैर, दो आंख, दो कान, एक नाक, एक मुंह, पेट-पीठ आदि जरूर हैं, जो शरीर का संचालन करते हैं। इसलिए हमें मोहन-सोहन, सीता-गीता और राम-बलराम वगैरा-वगैरा नाम से जाना-पहचाना जाता है।
हमारे ही नहीं, दुनिया के सभी इंसानों के ऐसे ही अंग-प्रत्यंग होते हैं। उन्हें भी पहचान के लिए कोई-न-कोई नाम से नवाजा जाता है। दुनिया में क्या कोई ऐसा भी इंसान होगा, जिसके दो के बजाय एक पैर, हाथ, कान या आंख होगा? या उसके दो सिर, पेट या पीठ होगा? इसका उत्तर है-नहीं। आम तौर पर यह असंभव है। क्योंकि ये स्थितियां इंसानी शरीर रचना के खिलाफ होगी। यदि कोई ऐसा शख्स होगा, तो यह उसका शारीरिक दोष होगा।
क्या कोई शख्स ऐसा भी होगा, जिसका दिमाग खोपड़ी में न रहकर घुटने में होगा। हरगिज नहीं! कोई इंसान ‘घुटना दिमाग’ हो सकता है, जो मुहावरे के रूप में उसकी मतिहीनता का परिचायक है, पर उसका दिमाग भी खोपड़ी के खोल में सीलबंद होगा।
इसी तरह किसी का दिमाग ‘खिसका हुआ’ हो सकता है, पर वह भी अपने निधारित स्थान से सरका हुआ नहीं होगा, अपितु परंपरा से हटकर सोच-विचार करनेवाला होगा।
–00–

44 views

Share on

Share on whatsapp
WhatsApp
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on email
Email
Share on print
Print
Share on skype
Skype
Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

Leave a Reply

ग़ज़ल – ए – गुमनाम-डॉ.सचितानंद-चौधरी

ग़ज़ल-21 मेरी ग़ज़लों की साज़ हो , नाज़ हो तुम मेरी साँस हो तुम , मेरी आवाज़ हो तुम मेरे वक़्त के आइने में ज़रा

Read More »

बड़ो का आशीर्वाद बना रहे-मानस-शर्मा

मैंने अपने बड़े लोगो का सम्मान करते हुए, हमेशा आशीर्वाद के लिए अपना सिर झुकाया है। इस लिए मुझे लोगो की शक्ल तो धुँधली ही

Read More »

Join Us on WhatsApp