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व्यक्तित्व विकास की महत्ता::-वीरेंद्र देवांगना

व्यक्तित्व विकास की महत्ता::
सफलता की प्राप्ति के लिए व्यक्तित्व का विकसित होना आवश्यक है। जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व जितना अधिक विकसित और समुन्नत होता है, उसको उतनी बड़ी कामयाबी हासिल होती है।
‘व्यक्तित्व के विकास’ को भली-भांति समझने के पूर्व यह समझना आवश्यक है कि शब्दद्वव ‘व्यक्तित्व’ व ‘विकास’ के मायने क्या है?
‘व्यक्तित्व’ शब्द भाव को व्यक्त करता है, जो दो सार्थक शब्दों यथा ‘व्यक्ति’ व ‘तत्व’ के मेल से बना है। यहां व्यक्ति से आशय शख्स, इंसान, मनुष्य या मानव से है, जिसमें स्त्री व पुरूष दोनों समाहित हैं।
तत्व से आशय-साधन, उपकरण, चीज, वस्तु आदि से है। तात्पर्य यह कि वह उपकरण, साधन, चीज या वस्तु; जिससे किसी व्यक्ति की पहचान मुकम्मल होती है, व्यक्तित्व या शख्सियत कहलाती है।
इसी तरह ‘विकास’ से आशय उन्नति, प्रगति व तरक्की से है। वह भी ऐसी, जो संतुलित व समुचित हो। जिसमें विकास के सारे तत्वों को समान महत्व दिया गया हो और सबकी तरक्की के लिए काम किया गया हो।
हम प्रायः सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल भवन, पंचायत भवन, आंगनबाड़ी भवन, नाली, तालाब, स्टापडेम आदि बनाते रहते हैं। यदा-कदा व भूले-भटके पेड़-पौधे भी लगा लेते हैं, किंतु उससे कही ज्यादा काट डालते हैं; नष्ट कर देते हैं।
इसी को कुछ नकचढ़े लोग ‘विकास की गंगा’ बहाना कहते हैं, तो कुछ सिरफिरे अपने मुंह मिया मिट्ठू बनते हुए अपनी तारीफ आप करते नहीं अधाते कि उनके शासनकाल में फलां-फलां विकास कार्य किया गया। जबकि ये फखत निर्माण कार्य होते हैं, जो जनता की गाढ़ी कमाई से किए जाते हैं।
विकास कार्य वे होते हैं, जो जनता के जीवनस्तर को ऊंचा उठाएं। उनकी माली हालत में सुधार लाएं। उनकी बदहाली व तंगहाली को दूर करें। इस लिहाज से उपर्युक्त कार्य युक्तियुक्त नहीं ठहरते। ये कार्य आमजन के जीवनस्तर को ऊंचाइयां प्रदान नहीं करते। अतएव, ये विकास कार्य नहीं है।
अन्य शब्दों में, स्कूल भवन का निर्माण हो गया, मगर जिन बच्चों के लिए स्कूल भवन का निर्माण किया गया, वे ही स्कूलों में जाने के बजाय, खेतों में काम करते हों, मिट्टी-गिट्टी के खदानों में खपते हों, होटलों-ढाबों में कप-बस्सी धोते हों, जंगलों-पहाड़ों में कंदमूल ढूंढ़ते हों या फिर नदियों-तालाबों में मछलियां पकड़ते हों; तो महज स्कूल भवन बना देने से बच्चों का विकास किस तरह होगा?
यह भी सच है कि पहले निर्माण होता है; फिर विकास और फिर स्नेह-स्नेह विस्तार। उदाहरणार्थ-पहले प्रायमरी स्कूल का निर्माण होता है। उसमें बच्चे पढ़ते और पास होते हैं। फिर माध्यमिक स्कूल में चले जाते हैं। माध्यमिक स्कूल में बच्चों का पदार्पण उनका विकास कहलाता है।
हालांकि केवल स्कूल में प्रवेश से उनका विकास संभव नही है, लेकिन माध्यमिक स्कूल की संपूर्ण सहूलियतें यथा-किताब-कापी, यूनिफार्म, फीस और सबसे बड़ी बात पर्याप्त शिक्षक मुहैया करा देना, विस्तार कार्य कहलाएगा।
मनुष्य जीवन भी इस सिद्धांत से अछूता नहीं है। उसके शरीर का पहले निर्माण होता है, फिर यथायोग्य विकास व विस्तार।
यह दुनिया भी इसी सिद्धांत पर अवलंबित है। दुनिया में, जो उन्नति व तरक्की दिखती है, वह भी इसी अटल व अचल सिद्धांत की देन है। इससे हमारा व आपका वजूद जुड़ा हुआ है।
वैज्ञानिक खोजों के मुताबिक, विकासवादी सिद्धांत कहता है कि पहले-पहल पृथ्वी का निर्माण हुआ, फिर उसमें मनुष्य, पशु-पक्षी व जीव-जंतु का उदभव व विकास। इसके पश्चात् विस्तार की अनगिनत गाथाएं लिखीं गईं। सतत लिखी जा रही हैं और आगे भी लिखी जाती रहेंगी। यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक पृथ्वी का अस्तित्व रहेगा।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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