प्रेरणा-फिरोज खान

प्रेरणा-फिरोज खान

होकर दुनिया की ख्वाहिशों से दूर, मै जिंदगी मे आगे बढूंगा होकर दुनिया की भी़ड से दूर, मै जिंदगी मे आगे बढूंगा चल कर धर्म के रास्ते पर, मै जिंदगी मे आगे बढूंगा करके इस दुनिया मे सबका भला और सोचकर इस दुनिया मे सबका भला , मै जिंदगी मे आगे बढूंगा लड़ते रहे चाहे
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पथ की अज्ञानता-फिरोज खान

इश्क की बातो से मै अंजान बैठा हूं करके प्यार तुझसे मै अंजान बैठा हूं देखते हैं मुझे मेरे ही घर वाले अलग निघा से क्यूंकि मै इस दुनिया की सब बातो से अंजान बैठा हूं पता नही क्यूँ दूर हो रहे हैं मेरे ही सगे संबंधी मुझसे शायद मै ही इन सब रिश्तो से
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इंतज़ार तेरा-पंकज शर्मा

मन नही समझता अब मेरा करता रहता है इंतज़ार तेरा , जी करता है चुरा लू तुझ से हर लम्हा तेरा। लगता है लूट लिया तुमने ये सुकून मेरा तुमको देखने से मिलती ख़ुशी वरना नही है कुछ भी नही है मुझ मे मेरा। नही कट रही राते नही हो रहा नया सवेरा, कोई नही
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मेरा परिचय- राजेंद्र कुमार बघेल

मेरा नाम है राजेंद्र कुमार बघेल थाना बसना महासमुंद जेल दिन मे बनाता कविता रात मे भेजता ईमेल जाता था स्कूल नाम है कूड़ेकेल पड़ता हूँ कम खेलता हूँ कम्प्युटर का खेल इसीलिए हो गया दसवी फेल तब बना थोड़ा भोला भला दसवी फिर ओपन मे डाला जपता था मे कृष्ण का माला एक बार
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स्वप्नातली ती-वैभव सिंह राजपूत

सौंदर्यवती रूपकन्या ती पाहता दिपावले नयन भूतलावर परीकण्या जशी शब्दांत लेखण्याइतपत भाग पाडणारे असे हे तिचे वर्णन.. कपाळ तिचे असे जसे कासाचे पठार हनुवटीला तीळ शोभे गळा कुंदणाचा हार…. मृगणायनापरी नयन तिचे चेहरा मनमोहक तो लाजरा गालावर ती गोड खळी जणू गुलाबाची साजरा….. रूप तिचे असे जसे नभात चांदणी चमकली करीता वर्णन तिचे लेखनिही माझी
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माझी कविता तिची आठवण-संदीप शंकर चिभडे

आठवणीच्या आठवणीत आठवण तिची आली, आठवणींचा तिने गजर केला , सकाळचाही बोलबाला तिनेच लावला,माझ्या आठवणींची आठवण तिनेच केली, अन तीच मला आज आठवनाशी झाली,खेळ कसा आहे आठवणींचा, जिची आठवण मला येते, तिला मी आठवत सुद्धा नाही, जीवनाचा खेळ मांडलाय निराळा, अन तीच समजतेय मला आज जगावेगळा, आठवण यावी अशी वेळ नाही, मी प्रेम केलय हा
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अब खत्म हुई -फिरोज खान

खत्म हुई तलाश प्यासे की, कुएं पर पहुंचकर खत्म हुई ख्वाहिशे प्यासे की, कुएं पर पहुंचकर खत्म हुआ सफर प्यासे का कुएं पर पहुंचकर और अब बूझ गयी प्यास प्यासे की , कुएं पर पहुंचकर इसलिए अब खत्म हुई प्यास प्यासे की, कुएं पर पहुंचकर.        फिरोज खान बंदायू,उत्तरप्रदेश 0

आज के समय में-दीशा शाह

आज के समय में कोई किसी का नहीं लोग मतलब के लिए बात करते है , अपना मतलब खत्म , अपना असली रूप दिखा देते है , इसमें कोई कोई अच्छा भी होता है , आज के समय में अच्छा लोग कम देखने को मिलते है कुछ अच्छे भी होते है , देश के लिए
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मी टू-विश्वम्भर पाण्डेय व्यग्र

ईलू ईलू था कभी अब मी-टू मी-टू होय पहले चुप रही जो अब, मीठी मीठी रोय मीठी मीठी रोय याद फिर आई नानी समझे लाले आज तूमड़ी निकली कांनी कहे व्यग्र कविराय कभी था यहाँ पर पीलू जब से मी-टू आया भूल गये हम भी ईलू        विश्वम्भर पाण्डेय व्यग्र    गंगापुर, राजस्थान
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प्रिय शब्द-दिव्यानि पाठक

मेरे शब्द मुझसे कुछ कहते हैं । मुझे निराश देख वो समझाते हैं । अमूर्त में भी मूर्त जाना हैं तुमने । जैसे शरीर में प्राण ड़ाला हैं तुमने । देखा नहीं जाता अब ये आशुपूर्ण चेहरा । जैसे चंद्र में गृहण लगा हो गेहरा। अंनतकाल से रिश्ता हैं मेरा और तुम्हारा। प्रत्येक भाव से
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