होली आई – पुष्कर कुमार

होली आई – पुष्कर कुमार

आई रे आई होली आई एक दुसरे को खुब रंग लगाई रे देखो कितने रंग-बिरंगी पिचकारी कुछ छोेटे,कुछ बड़े ,कुछ पतले कुछ मोटे, कितने रंग-बिरंगे पिचकारी रे खेलो बच्चो प्यार से,आती साल भर मे एक बार यह रंगा-रंग त्योहार रे । आई रे आई होली आई देखो इन्द्रधनुष धरती पर आई रे त्योहार है यह
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एक संसार बनाना हैं – अहमद सरफराज

एक संसार बनाना है,,,,,,,,,, दुख,आंसू और गम को मिटाकर एक संसार बनाना हैं दर्द के आंसूओ से सिचकर खुशियों का फूल खिलाना है एक संसार ,,,,,,,,,,,,,,, आए हैं,हम इस दुनिया में हमें खाली हाथ ही जाना है जाने के बाद ये जग याद करे ऐसा कुछ करके जाना है एक संसार,,,,,,,,,,,,,,,, सुख मिला तो बाटेंगे
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मेर कलेजे का टुकड़ा – अविनाश सिंह

तुमने जब इस धरती पे जन्म लिया, खिल उठा था घर का कोना कोना। इसी लिए तो सब कहते थे तुम थे मेरे जीगर का सोना सोना। तुम्हारे लिए मैने न जाने कितने सपने सजाए रखी थी, अपने प्रदुमन को देख के मै न जाने कितना खिलखिलाती थी। मेरे सपनों का वो राजकुमार था, मेरे
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हम हैं देशी – हम हैं देशी

कुमार विश्वास के गीत हम हैं देशी में उन्होंने कुछ ज्यादा ही फेंक फेंक कर लिखा पेश है उनके गीत की तर्ज पर समाज को आईना दिखाता हुआ मेरा यह गीत जिसे फेंक फेंक कर नही लपेट लपेट कर लिखा है एशिया के हम परिंदे ,लूटना है जद हमारी जानते हैं चाँद सूरज, फेंकने की
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वो हमारी महफ़िल में आना भूल गए – राहुल रेड

वो हमारी महफ़िल में आना भूल गए हम भी उन्हें याद दिलाना भूल गए मोहब्बत में जब से ठोंकर खाई है तब से हम भी दिल लगाना भूल गए भूलने की चाह में भूल गए खुद को जिसे भूलना था, उसे भुलाना भूल गए दौर-ए-सुखन में मसरूफ़ रहे इतना ज़माने में शहोरत कामना भूल गए
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दम घुटता है – अरूण आजाद

ऐ ज़िदगी क्या तेरा मुझसे कोई शिकवा गिला है । किस्मत साथ दे रही है वक्त अंत करने पर तुला है, मै उतना मज़बूत भी नही जितना तू समझ रहा है कह नही पा रहा लेकिन ……. दम घुट रहा है ।। अभी अभी तो शुरूआत की है तू क्यो इतनी जल्लादी दिखा रहा है
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जरूरत क्या थी – राजपुत कमलेश “कमल”

युं ईश्क मे हद से गुजर जाने की, जरूरत क्या थी? जब दरवाजा था तो खिड़की से, उनके घर जानेकी जरूरत क्या थी? युं ईश्क मे हद से गुजर जाने की, जरूरत क्या थी? जानते थे कि जायेका दे जाएगी,-२ तो हरी मिर्च चबाने कि जरूरत क्या थी? युं ईश्क मे हद से गुजर जाने
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अधूरी जिंदगी – थान सिंह तराना

अधूरी जिंदगी यारो अधूरा फलसफ़ा निकला, जिसकी नई कहानी थी पुराना वो मकां निकला। तमाम उम्र में कोई तो मेरा हो नहीं पाया, जिसे अपना बनाया था पराया वो यहाँ निकला। कोई जज्बातों में मेरे अक्सर आ ही जाता है, मेरे आखिर ख्यालों में समन्दर पीर का निकला। कभी कोई तमन्ना थी मुझे भी आशियाने
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तू सब कुछ है माँ -अविनाश सिंह

ममता की छांव है मेरी मां, मेरे हर दर्द की दुआ है मेरी मां। नन्हे कदमों से लेकर सफलताओं की सीढ़ियों पर जिस ने चढ़ाया वह है मेरी प्यारी मां। गलत रास्ते पर चलने से जिसने रोका, मेरी खुशी के लिए अपनी खुशी कि त्याग करने वाली वह है मेरी प्यारी मां। मेरी गलतियों पर
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गरीब माँ का दर्द – अविनाश सिंह

भटकते राह में मैंने उस मां को देखा, आंखों में आंसू और दो रोटी की चाह को देखा। कभी इधर जाती कभी उधर जाती, लोगों से सिर्फ और सिर्फ दुत्कारी जाती। ना कपड़े कि चाह है ना मकान की आश है, दो वक़्त कि रोटी पाने कि बस चाह है। लोगो से फिर भी कुछ
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