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कविताएँ

आज अभी है-सुप्रिया-कुमारी

ख्वाब देखो जमीन से उठो मंजिल तुम्हारे सामने हैं। मुड़ के मत देख समय को आज का दिन तेरे साथ है। आजकल आजकल बोलकर मत खेल समय के साथ, भूल जाएगा मंजिल का राह कौन सा था तेरे पास, ट्राइल का यह त्यौहार है। डिप्रेशन में ना तु जा, मंजिल तुझे अपनानी है तो, ट्राइल …

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माँ-अंशिका-उपाध्याय

घुटनों पर रेंगते रेंगते, कब पैरों पर खड़ा हुआ। तेरी ममता की छाव में, जाने कब बड़ा हुआ।। काला टीका दूध मलाई, आज भी सब कुछ वैसा है। एक मैं ही मैं हु हर जगह, माँ प्यार ये तेरा कैसा है? कितना भी हो जाऊ बड़ा, माँ! आज भी तेरा बच्चा हु। माँ! आज भी …

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“संस्कृति से खुलेआम खेल रहा है इंसान”-श्रेयांश-जैन

संस्कृति से खुलेआम खेल रहा है इंसान, चकाचौंध की दुनिया में जाकर भुल रहा अपनी पहचान, संस्कृति अब इंसान से नहीं बच पा रही है, इंसान के दिल में अब पश्चिमी संस्कृति जो भाती जा रही है । ताप-तपस्या ओर बलिदानो की इस संस्कृति पर सूतक जो लग गया है, भाई-बहिन का प्यारा रिश्ता भी …

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कोट्स -पूनम मिश्रा

कुछ किस्से मेरे दिल में है कुछ किस्से लफ्जों में है कुछ किस्से कागजों में है कुछ किस्से मेरे शब्दों में है कैसे भूलू में वह लम्हे जो मेरे आती-जाती हर सांस में है

बचपन-दिव्यांश-सिंह

बचपन छोटा जीवन अंकुर, वृक्ष कपोले निगल के आया| ममता भरी इन आंखों में, इक आशीर्वाद संभल के आया| तो छोटे जीवन को मां तुम, मेरी सांसो में ला देना | बचपन की छोटी बातें सब, खुशी से हमको बता देना| अब भी हसीन सपने, आंखों में पल रहे हैं| मां सुलझी हुई है यादें, …

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‍श्रृंगार-संतोष कुमार कोली

सजने संवरने नायिका बैठी, खोल श्रृंगारदान, है शब्दों का टोटा, नहीं कर सकूं बखान। सिर का खोल रही जूड़ा, बैठी वह केश सुखाय, जग में अमिट अंधेरा, धीरे-धीरे कालिमा छाय। पूर्णिमा की ज्योत्स्ना से, श्वेत पाउडर रही छिड़काय, चारू चंद्र की चंचल किरनें, खेले आंख मिचोली आय। फैली मायामय ज्योत्स्ना, संवृत जहान। है शब्दों का …

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“अपना रूप हमेशा दिखाती है प्रकृती”-श्रेयांश-जैन

अपना रूप हमेशा दिखाती है प्रकृती, कभी धूप तो कभी छांव का अहसास कराती है प्रकृति, हर मौसम में भी जीवन जीना सिखाती है प्रकृति, हमारी भूख-प्यास भी मिटाती है प्रकृति। कभी बारिश तो कभी चांदनी की रोशनी दिखाती है प्रकृती, समय-समय पर अपने करतब दिखाती है प्रकृती, इंसान को इंसान से भी मिलवाती है …

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दिवसनाथ आकांक्षा-अशोक-यदव

तुम चाँद कभी बन जाना,सूरज मैं भी बन जाउंगा। तुम शीतलता बरसाना,मैं आग में जल जाऊँगा ।। सज-धजके बैठे रहना तुम,करके अंग सोलह श्रृंगार। दुल्हन बन मुस्कराना तुम,संग चलने को रहना तैयार।। काली घटाओं का कुंतल,मांघमोती बनाना तारक को। कपाल पटिया माणिक है,मुकुट बना स्वर्ण चमक को।। नयन नील गगन की आभा, दंत रजत द्रव्य …

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