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जिन्दगी की जंग निर्भया के संग

ऐ दरिंदो तुम्हारी दरिंदगी की उम्र कितनी है ये तो देखो हमारे हौसलों की उड़ान कितनी है हमारे पड़ कतरोगे खुद कतर दिये जाओगे बस कहती हूँ।हाँ कहती हूँ .. मिट्टी में मिला दिये जाओगे जिस्म को नोच खाने वालों अपने रूह की प्यास बुझाने वालों क्या तम्हें किसी की सिसकियाँ सुनायी नहीं देती अपने ईमान को बेच खाने वालों क्या समझते हो तुम कमजोर है हम तुम्हारी एकता के सामने खेलोड़ है हम तुम्हारी दरिंदगी भरी बदसलुकियां आखिर कब तक सहेंगे हम जब मैदान में उतर जायें तो तुम भी कहोगे बेजोड़ हम हम इस दुनिया से चले भी गये न तुम्हारे लिये एक पैगाम छोड़ जायेंगे जब तक ना लूँ अपने जिस्मोसितम का बदला तब तक तुम्हारे रूह-ऐ-जिस्म को तड़पायेंगे

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