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आदित्योदय-अशोक-यादव

चाँद जैसे शीतलता तुम देना, सूरज बनके तपन मुझे होता है।
मैं क्या करूँ मेरे ऐ कुदरत ? मेरा तन-बदन भी जलता है।।

ख्वाबों के आशियानों का घर मैं बनाया है, यादों के सुनहरे पन्नों से मन मैंने सजाया है। मिलन ओ पल बहुत दिनों के बाद आया है, देखूं जिधर मैं तेरा रूप का सूरूर छाया है।।

चलता हूं अकेला अपनी राहों में, कोई नहीं है पास संग चलने को। बिछड़े गया मैं तुमसे ओ जाना, छोड़ गया तू मुझको जलने को।।

निशा हुआ अवसान पल पल, तुम्हारे विरह की आग है धधक। हुआ प्रभात नवीन रश्मि लेकर, भूमा की गोद में है लघु भभक।।

बढ़ता मैं धीरे-धीरे तारापथ से, ‌‌मयूखी की आभा तीव्र संग-जंग। मेघों के संग खेलता आंखमिचोली , झूमता मिल जाता उनके रंग में रंग।।

दामिनी की दमक में मुग्ध होकर, कुछ पल ठहर जाता उनके संग। सुधि खोकर ज्योत्सना पाश की, बढ़ता पथ में मारुत वेग सा ढंग।।

पायस दामिनी भिगो रहे तन को, नील वर्षों से ना मैंने स्नान किया। नृत्य संगीत मुग्ध कर रहा मुझको, प्रदोष की क्षोभ का ध्यान किया।।

दिव्यधाम के संदेशा पाकर मैं चला, परमेश की आज्ञा हेतु था तत्पर। बढ़ा आगे दिव्यरथ जो द्रुतगति से, हुआ विलंब मोहांध नहीं मैं परात्पर।।

चक्र ब्रह्मांड का थमा कुछ घड़ी में, वासव का वज्र दंड दिया केतु को। लेकर संदेशा राहु राह में आया है, द्रुत घोटक उडनपखेरू सेतु को।।

सुन प्रचंड मार्तंड राहु की बात, जागृत मां वसुंधरा की गोद में। कहा धरणी ने चक्षु खोल रवि, निद्रपाश जागेंगे जन मोद में।।

प्रभाकर की प्रभा से हर्षित हुए, जन जग चले नित्य सत्कर्म को। तरु की डाली में विहग चहक उठे, नहीं जान पाए कोई इस मर्म को।।

ओ प्यारी शशि लंबा मार्ग आऊं कैसे ? तुम बिन मैं कुछ नहीं न था पहले भी। दर्द हृदय का कैसे दिखाऊं तुम्हें मैं ? ‌मैं दूर से ही देखता तुम्हारे चेहरे भी।।

पूर्वाह्न में था मैं शीतल कुमार उत्पल, खुद हंसता जग को भी मैं हंसाता था। झूम-झूम तरुवर नाचते गाते गीत खग, नैन नील लड़ाते सब जन बहलाता था।।

अब मैं हूं मध्यान्ह द्वीदश विकराल काल, रक्त प्रस्वेद प्रचंड छलक रहा है वपु से। मृषा सा है मृगतृष्णा रसना रस नहीं था, नैन उठाएं मेघ ओर कभी जननी वसु से।।

बढ़ने लगे रथ के पहिए मंजिल की ओर, ढला दिवस आया गोधूलि का पावनबेला। मधुमति से मिलने मधु हुआ आतुर बेहाल, त्रिदश कहां है सुध नहीं खेल रहा है खेला ?

संध्या की बेला में अंगना आंगन में खड़ी थी, काम से लौटे कर्मकार मंद मुस्कान आभा लिए। था इंतजार सबको उसका आएंगे पालनहार, जठर की रोटी लेकर प्रफुल्ल अंगअंबा लिए।।

मैं भी चला जन प्रेयसी मिलन को आतुर मन, ‌डग में बढ़ाते हुए घोटक द्रुतगति से मिलन आतुर।
अब हर्षित है मन व्याकुल हृदय धड़क रहा, अब मिलन होगा प्रेयसी से मन की इच्छा होगा दूर।।

कवि- अशोक कुमार यादव।

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