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“आहट” से ,” आह !” तक-अजय-प्रताप सिंह-

हैवानियत की हमने
हदें पार कर दी सारी
इंसानियत की राख से
उठता हुआ धुआ है ॥

बेबस अबोध बच्ची
निर्ममता की भेंट चढ़ती,
क्यों किलकारीयों से चीखों ‘
तक का सफर चुना है । । इंसानियत …

बेटी किसी की होगी
होगी बहन किसी की,
दिखलाती मात बनकर ,
जीवन का आईना है ॥ इसानियत …….

छुपाते हो लाश उसकी
आंचल में जो छुपा था,
बेशर्मो ,हब्शी, भेडियो ,
अंधों ,यही गुनाह है ॥ इंसानियत …..

क्यों सब्र नहीं होता
नित सिसकियों को सुनकर,
क्यों तोड़ते हो उसको,
घर -घर का जो खिलौना है ॥ इंसानियत …….

अपनी हवस की भूख को
गर ना मिटा सको तो ,
जीवन ही त्याग दो तुम ,
बेहतर कई गुना है ॥ इंसानियत ……..

विश्वास का खून करके
देकर दगा सगों को,
धोखे से मानते हो,
मर्दानगी जवॉ है ॥ इंसानियत ……..

छोटा सा यह सफर है
दरिंदगी में ना बिताते ,
जल्दी ही खत्म होगा,
2 दिन का कारवां है ॥

चल 8400000 योनियों में
माना कि थक गए हो ,
उस मुकाम को तो ढूंढो,
जाना तुम्हें जहां है ॥ इंसानियत ……..

तूफानों से जीतना भी
जीवन की एक कला है,
गैरों को छोड़ तुमको,
खुद से ही जीतना है ॥

भारत की संस्कृति में
ऐसा तो ना कभी था,
हैरान हूं क्यों तुमने,
यह आशियां चुना है ॥ इंसानियत ………

सोचों की गहराइयों में
इतनी ही बस पहुंच थी ,
नर्वस की आह बनकर,
यह दर्द ए दिल बयां है ॥ इंसानियत …..

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