आना-जाना – मुनमुन सिंह

आना-जाना – मुनमुन सिंह

मुझे था धरा पर अकेले आना
मुझे है धरा से अकेले जाना।
रूपये नहीं, अन्न नहीं, न बैठने का अंगना
पत्नी नहीं, तनय नहीं, न सेवा के लिए तनया।
मुझे था धरा पर अकेले आना
मुझे है धरा से अकेले जाना।
अपनी अवनी नहीं, संसार नहीं, न रक्षा के लिए पदमासना।
नीर नहीं, नीरद नहीं, न ठहरने के लिए छाव।
मुझे था धरा पर अकेले आना
मुझे है धरा से अकेले जाना।

–मुनमुन सिंह

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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