आत्महत्या -जी के जसनाथी

आत्महत्या -जी के जसनाथी

वो अन्दर ही अन्दर टुटा सा
खुद कि दुनिया से रुठा सा
कर कर प्रयास निरन्तर हारा
वो भी था किसी माँ का दुलारा
बाप का साया बचपन मे खोया
दे आग पिता कि चिता को न रोया
इकलौती गरीब माँ का सहारा था
वो खुद कि ही मजबुरियों से हारा था
दर दर भटक कर भी
कुछ कर सका न वह
रोज चुनता ये उपदेश
कि हिम्मत हारना
बढो लङो और
कुछ नया कर डालो
पर लङका इतना खास न था
हार गया
खुद ही खुद मैं वह मार गया
कोई पुछ जा कर सवाल
उसकी लटकती लाश से
क्या गुजरी होगी उस पल
पुछो उस आखरी अहसास से
किन परिस्थितियों में उसने
अपना अनमोल जीवन गवा डाला
क्यों खुद को ही फंदे से लटका गया
किसी ने न जानी
गुजरा वह किन हालातों से
कोई न वाकिफ हुआ
उसके जज्बातों से
ना जाने कितने
रोज ही सुली चढते है
कितने ही चढने कि सोचते है
खेती बेरोजगारी मायुसी बेवफाई
लोगों कि कर्जदारि घरेलू झगङे
इन सब के हाथों मरते है
नाम यह होता है
आत्महत्या की
पर क्यों कि ? गोविंद
इसकी सुध तो किसी ने ना ली ………..

 

जी के जसनाथी

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