आवारा आशिक – प्रणय कुमार

आवारा आशिक – प्रणय कुमार

कभी दिवालों से,
कभी हवाओं से बातें करता फिरता हूँ मैं |

कभी उसकी निगाहों से,
कभी उसकी अदाओं से शर्माता फिरता हूँ मैं |

कभी आशिक की तरह,
कभी आवारों की तरह घूमता फिरता हूँ मैं |

कभी उसके दरवाजे को,
कभी उसकी खिड़कियों को घूरता फिरता हूँ मैं |

जब भी देखना चाहती है वह मुझे,
कभी उसकी मदमस्त नजरों से,
कभी दीवानगी की लहरों से बचते-बचता फिरता हूँ मैं |

दिल करता है बता दूँ उसे, मगर
कभी खुद से,
कभी ज़माने से घबराता फिरता हूँ मैं |

Pranay kumarप्रणय कुमार
कुर्सेला ( कटिहार )

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