अभी जरा सी आस हे – बबीता खंडूरी

अभी जरा सी आस हे – बबीता खंडूरी

अभी जरा सी आस हे
तड़प रही हे आह अटक रही हे साँस
लम्हों को जिंदगी की तलाश हे
मुरीद हूँ में जिस चेहरे का
उनके आने की अभी आस हे ,
दवा ना करेगी काम कोई
ना कोई काढा असर करेगा
आने दो मेहबूब मेरा
उनका चेहरा असर करेगा ,
बेजान इन बाजुओं पर लगाओ ना कोई लेप
ये भी बेअसर रहेगा
थामेगा मेरा खुदा इन्हें
ये तभी जी उठेगा ,
मेरी पलकों को बिछे रेहने दो
मेरी आँखों पर
दुनिया देखने की हसरत नहीं रही
ढूँढ लाओ मेहबूब मेरा
अब ज्यादा साँसे नहीं रही ,
भर के इन निगाहों में
जाना हे बहुत दूर
तस्वीर ही दिख्लदौ कोई उनकी
ए मेरे हुजूर ,
बुझती इन निगाहों को
झलक उनकी जरा दीख्लादो
मरता हुआ में आशिक हूँ
जाकर कोई उंहे बता दो ,
आखरी कुछ अल्फाज़ फंसे हे
मेरे मन के भीतर
ना मिले मेहबूब मेरा
उनकी जूतियां ही लादो ,
चूम कर में हुस्न खुदा को
रुक्सत ही होजाऊं
फिर मिलूंगा एक और जनम में
जाकर उंहे बता दो ,
तुम्हें खुदा का वास्ता
मेरी कब्र की माटी को
उनके आँगन तक लेजाना
एक काफिर था तेरी अदा का
ये केह के माटी मेरी तुम
उनके आँगन में फेलाना ,
मुरीद हूँ में उस खुदा का
उनके कदमों में आकर
बेवफाई का मेरा पाप धुलेगा
जब जब गुजरेंगी मुझपर से वो
मेरी रूह को सुकूं मिलेगा ।

Babita Khanduriबबीता खंडूरी
फरीदाबाद, (हरियाणा)

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