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अगर चाह तुमको अपनों से है-सुनील-दुबे

अगर चाह तुमको अपनों से है,
यूं चिलमन में चेहरा छुपाओ न ऐसे।
तुम्हें भर नज़र देखना चाहते हैं,
नज़र फेरकर अब जाओ न ऐसे।

यही मेरी चाहत है दिल में रहो तुम,
किसी और से दिल लगाओ न ऐसे।
जो उल्फत के दीपक जलाये थे मैंने,
हवा देके उसको बुझाओ न ऐसे।

सफर है कठिन दूर मंजिल बहुत है,
सरे राह कांटे बिछाओ न ऐसे।
बहुत आजमाया जमाने ने मुझको,
मुझे और तुम आजमाओ न ऐसे।

बाहें झटक कर चले जाते हो,
मेरे दिल की धड़कन बढ़ाओ न ऐसे।
अगर चाह तुमको अपनों से है,
यूं चिलमन में चेहरा छुपाओ न ऐसे।

    ✍ सुनील दुबे 
      जौनपुर (उ.प्र.)

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