आहिस्ता-आहिस्ता मौसम बदलने लगा है – शोभा(सृष्टि)

आहिस्ता-आहिस्ता मौसम बदलने लगा है – शोभा(सृष्टि)

आहिस्ता-आहिस्ता मौसम बदलने लगा है।
मंद पड़ चुका सितारा फिर चमकने लगा है।
छा गई थी मायूसी कुछ समय के लिए जिस जगह।
वह साहित्य का दरबार फिर सजने लगा है।
समय अपनी धारा में निरन्तर बहता रहता है।
कोई सुने या नजरंदाज करे , शान्ति से कुछ कहता रहता है।
जिदंगी ईश्वर की देन है अनमोल।
फिर भी इंसान बोझ मानकर सहता रहता है।

–शोभा(सृष्टि)

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