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आंखे थी खुली हुई…..-पारगी गुप्ता

आंखे थी खुली हुई
पर अंधत्व जगा हुआ था,
दूध चढ़ा रहे थे लोग पत्थर पर
और कोई भूखा नज़दीक पड़ा हुआ था….
डाल रहे थे लोग खूब पैसा
और चढ़ावा भी खूब चढ़ा रहे थे
पर ये न देखा क़िसी ने ,की
कई आशा के दीप हाथ अपने फ़ैला रहे थे….
आंखे थी खुली हुई
पर अंधत्व जगा हुआ था,
हम घूम रहे थे AC कार में
और कईयों का परिवार
फुटपाथ पर ..
तपती धूप में पड़ा हुआ था ।
न थी सिर पे छत
और न अपनों का ही सहारा था
वो झुग्गियों में रहने वाले
फकीर थे यारों….
उनके पास तो केवल
आसमां ही नज़ारा था!
आंखे थी खुली हुई,
पर अंधत्व जगा हुआ था
तलाश रहा था भोजन कूड़े में से एक बच्चा
और कमबख्त एक इन्सान उस बच्चे की
फ़ोटो खिचने में लगा हुआ था,
उस तस्वीर का प्रचार हुआ जमाने में
वो लाखों में थी बिक गई
पर न मिला भेाजन एक वक्त का
जिसमे उदास चेहरा लिए वो बच्चा खड़ा था…!
मै जब थोड़ी आगे बढ़ी…
मैंने अपने को अंजान पाया
मेले की एक भीड़ में,
बहुत शोर करता इन्सान पाया..,
आवाजे न थी निकल रही
गला भी सुख चुका था,
पर बेचने को समान अपना
वहां शोर खूब गूंज रहा था..!
मुस्कान मेरी थम गई
आंखे भी नम-सी गई
होने को मैं नि:शब्द हो गई..
कुछ दृश्य ही बदल गया था,
जब बेचने को गुब्बारा
एक छोटा मासूम सा बच्चा
नज़दीक मेरे आ रहा था…,
मेले की उस चकाचौंध भीड़ में
मैंने अपने को अंजान पाया!
उस दिन देखा ज़माना एक नया
अमीरों में देखा नज़रिया ग़ज़ब का
और गरीबों में मैंने भगवान पाया…!
~रचनाकार
~कुमारी परागी गुप्ता

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Paragi-Gupta

Paragi-Gupta

Favorite hobby- study, listening music, reading books Favorite game - carrom,chase,ludo, bedminton, kabddi, cricket Favorite skim- social service , service for our country in which NCC,NSS( I offer my services in both the areas) I also want to join army My age -17years DOB- 17/09/2003

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