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अनाथ लड़की-डॉ.संजना भू

सावंली सीधी वो लड़की, वदन पर काले बिखरे बाल|
जलती धूप में चलती, चेहरा आग सा था लाल| |
गोद में भाई को लेके, कमर पर थी उसको टेके|
मांग खाने को करती थी, भूख से वह तड़पती थी||
न मां का प्यार बोली में, न दाना अनाज झोली में|
घूमती इधर उधर वह थी, दीन निर्धन की टोली में||
वसन काया की थी जर्जर, पसीने से वे तरबतर|
खोजते सुख की छाया को, हो गये दोनों ही बेघर||
देखते लंगर जब चलते, अन्न न ठोकर ही मिलते|
कोसते अपने जीवन को, जन्म मानव का क्यूँ मिलते||
हे ईश्वर रचा क्यूँ संसार, यहाँ आपस में न है प्यार|
जहाँ मानवता न समझे, वहाँ जीवन है फिर बेकार||
क्यूँ छीना ममता की छाया, क्यूँ कर दी बोझ यह काया|
कहाँ लाकर हमें छोडा़, जहाँ अपनों को न पाया||
उठा लो जग से हे भगवन्, यहाँ मानव हो चुका अधम|
खो चुके अपने भावों को, तन कलुषित मन निर्मम||

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