अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी-मनोज गोयल

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी-मनोज गोयल

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी
आज कुछ तो बदली सी है।

टूट गया भले समय का कांटा
पर वक्त में तब्दीली सी है।
दुःख तो बहुत हुआ टूटने से
पर अब कहा वो बेचेनी है।।

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी
आज कुछ तो बदली सी है।

नादां था सोचा के समझोगी तुम
दो नेनों की चाहत जो देखे थमे तुझपे।
शायद समझा भी नही पाया तुम्है ठीक से
पर अब कहा यह सब जरूरी है।।

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी
आज कुछ तो बदली सी है।

मलाल बस एक बात का है
जान नही पाया तु मग़रूर थी या मजबूर ।
पर फर्क पड़ता है क्या
अब फासलो की जगह मीलों दूरी है।।

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी
आज कुछ तो बदली सी है।

क्यूँ लगाऊँ लांछन तुम पर
जब किस्मत में नही तुम्हारी यारी है।
लेकिन मोहब्बत भी कम नही मेरी
पर कहा होने को अब रंगदारी है।।

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी
आज कुछ तो बदली सी है।

तेरे आने से पहले तेरे जाने का पैगाम मिला
समझता हुँ उस खत की भी मज़बूरी है।
पर तु माने या ना माने
तु आज भी मुझे उतनी जरूरी है।।

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी
आज कुछ तो बदली सी है।

बहुत लिख चुका हुँ तुझे डायरी के पन्नो पर
बस खत्म होने को “मन” की स्याही है।
बिछड़ा हुँ तुमसे मैं इसतरह के
नसीब में कहा सही से जुदाई है।।

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी
आज कुछ तो बदली सी है।

बस इसी उम्मीद से सोना चाहता हुँ
और काम तुझे ये निशा देना चाहता हुँ के।
कल सहर उसके ख़्यालों से परे हो
टूटा ही हो भले कांटा पर लम्हे नये हो।।

अटकी पड़ी थी जो घड़ी मेरी
आज कुछ तो बदली सी है।

 

      मनोज गोयल

    इंदौर, मध्यप्रदेश

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