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❇ अतीत, आज और प्रश्न ❇-अभिराज राजपूत

हर तरफ ढूंढता राजपाठ, क्यों ना अतीत पढ़ पाया है।
क्यों मनुज जानता ना इस पथ पर, क्या खोया-क्या पाया है।
क्यों आज राजप्रसादो तक, पहुंचें ना जनता की पुकार।
क्यों सोच-समझ इन अंधो ने, दरबारों वहीं बैठाया है।

पथभ्रष्टों की सरकारी में, क्या हाल हुआ दरबारों का ?
दरबार बचे सरदारों के, भगवान बचा लाचारों का।
संरक्षक सारे मौन खड़े, संदेश उठा हर सायें पर।
दर्शक बनकर हंसती दुनिया, दुस्साशान हर चौराहे पर।
अंतर के अंधे शासक ने, क्या बात किसी की मानी है?
पोथी के अंतिम पन्नों में, विदुरों की बची कहानी है।
ज्ञानवान-विद्वान मनुज, जीवन अज्ञात बिताते हैं।
दरबार भरा पथभ्रष्टों से, शकुनी सत्ता सुख पाते हैं।
बनते शुभचिंतक स्वार्थ साध, मन के कपटी बातों के नेक।
अब फिरे शिखंडी घर-घर में, ले चेहरे पर चेहरे अनेक।
फिर राजनीति के पासों में, हारे बैठे हैं धर्मराज।
ना जीत कठिन ना हार सरल, खुद से खुद का है द्वंद आज।
फिर एक काल फिरता है, क्रुद्ध।
फिर एक उठा है, धर्मयुद्ध।
फिर एक समय की वेदी पर, अपने हैं अपनों के विरुद्ध।
भीष्म एक है, द्रोण एक।
नर की वैभवता, कर्ण एक।
फिर एक समर का ज्वार उठा,हर घर में दुर्योधन अनेक।
पर एक प्रश्न है, इस युग में क्या कृष्ण धरा पर आएगा?
फिर भी कोई संदेह नहीं, अर्जुन अंतिम रण पाएगा।
:-Abhiraj Rajput

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