Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

बदले युग का प्रेम-अजय प्रताप सिंह

युग बदला प्रेमी बदले बदली प्रेम की परिभाषा
मासूम प्रेम से बढ़कर पाई प्रेमी पाने की आशा
जो आंखें पढ़ लेती थी मूक प्रेम की भाषा,
है चौकन्नी देख रही है उलट ना जाए पाशा ॥
सार्वजनिक है प्रेम
सर्वविदित है प्रेम
घटे कहां अनहोनी,
मोहन नहीं अब प्रेम ॥
प्रेम नहीं अब अंधा
शर्म रहे शर्मिंदा
व्यापारी हर प्रेमी ,
प्रेम बना अब धंधा ॥
नवयुग प्रेमी जबरदस्त
गली-गली की गश्त
प्रेम पुरातन धराशाई ,
बदनाम शख्सियत मस्त ॥
अभिलाषा प्रेमी पाने की
हर हद से गुजर जाने की
या तो खर्चे से मिल जाए,
या बेबस कर पाने की ॥

Leave a Reply

Join Us on WhatsApp