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बह रही खून कि धारा – Aman Sharma

बह रही खून कि धारा , ढूंड रही कोई किनारा ।
धड़कता सा ये दिल कर रहा कोई इशारा ।
कहता है ले चल सपनों कि दुनियां में , जहां मन लगता हमारा ।
जहां वादियां हो हसिन , जो हो सबसे रंगीन ।
जहां रोके न हमें कोई ,जहीं टोके न हमें कोई ।
मैं कहता हूं , रूक जा जरा इंतजार कर ।
मुझ पर न सही तो खुद पर एतवार कर ।
जिंदगी अभी बहुत लंम्बी है,जिसमें काफि उमीदें टंगी है ।
रूक जा जरा सपने न देख वो जो पुरे न हो सके ।
चलते जाना है अपने सपनों से मुहं मोड़ कर , जिनी है जिंदगी अपनों की उमीदों को जोड़ कर ।
दिल कहे जिंदगी क्या है , दो दिन कि मेहमान है चली जाएगी ।
तेरी ख्बाइशें यूं हि रह जाएगी ।
जिंदगी क्या है ये तो चली जाएगी ,
फिर कभी वापिस नहीं आएगी ।
जिंदगी को नहीं अपने सपनों के लिए जिना सिख,
अपनों के लिए हि सही लेकिन अपने लिए भी जिना सिख ।

By Amāñ Sharma

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3 thoughts on “बह रही खून कि धारा – Aman Sharma”

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