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भ्रष्ट नेता-बलराम-सिंह

लोकतंत्र के मंदिर को,बना दिया व्यापार
जनता करती तराहिमाम,नेता हैं खुशीहाल।

जाती बाद और भ्रष्टाचार,इनका हैं हथिया
इन सब के वार कभी भी,जाता नहीं बेकार।

राजनीति में धर्म का,हो रहा है व्यापार
जनता को कंगाल कर,चला रही सरकार।

पढ़े लिखे विद्वानों का,अब रहा कोई मोल
चोर उच्चकों का हो रहा, सम्मान चारों ओर।

लोकतंत्र में तानाशाही,करते बड़े ही अत्याचार
सब कुछ अपना खो कर,जनता है लाचार।

राजनीति की बंदूक से,करते हैं ये वार
निर्धनों के सपनों का,करते हैं संहार।

जान जन की आवाज को,काटे शासन की तलवार
चुन चुन कर लाते हैं,धोखा खाते बारम्बार।

लोकतंत्र एक मंदिर हैं,नेता हैं भगवान
इनकी पूजा करे जो,पाएं भ्रष्टाचार की वरदान।

बलराम सिंह की अपनी कलम से

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