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बारिश आओ ना – आराधना सिंह

घनघोर घटा बादल बन कर हर रोज नजर तुम आती हो
काले रूप को धर कर के बादल बन नजर तुम आती हो
काले रूप के साथ तुम अपनी आवाज गरज में आती हो
पर फिर भी तुम न जाने क्यो अब तक धरा पर आने से कतराती हो
आ जाओ ना बारिश तुम इतना भी क्यों इतराती हो।

महज इस धरा पर तुम चंद माह के लिए आती हो
इसमें भी तुम आने में यहाँ इतना वक्त लगाती हो
जरा तरस खाओ तुम इन खेतो और खलियानो पर
सुख जाएंगे ये तुम्हारे बिन बोलो इतना क्यों सताती हो
आ जाओ ना बारिश तुम इतना भी क्यों इतराती हो।

मोर पपिहा मेघ देखो तुम बिन कैसे तड़प रहे हैं
इनके तड़प को मिटाने बोलो क्यों नही आती हो
तड़प रहें है देखो कैसे मीन नदी तालाब के
अपनी बूँद के सागर से क्यों नही इनका प्यास बुझाती हो
आ जाओ ना बारिश तुम इतना भी क्यों इतराती हो।

सुख गयी है ताल तलैया मन खिन्न देखो किसान का है
सोच में है कितना देखो तुम्हारे अब तक न आने से
पेड़ पौधे पंछी जगत की भी यह सोच है यह सोच नही केवल इंसान का है
निरमम बन कर के तुम इन पर ऐसा कहर क्यों ढाती हो
आ जाओ ना बारिश तुम इतना भी क्यों इतराती हो।

आराधना सिंह
गुजरात सुरत

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Ravi Kumar

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

5 thoughts on “बारिश आओ ना – आराधना सिंह”

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