बचपन-जी के जेसनथी

बचपन-जी के जेसनथी

बचपन कितना सुहाना होता है
न आगे का ना पिछे का डर होता है
दुनिया मैं क्या क्या होता है
बचपन तो बस अनजान नासमझ होता है
कुछ यादें ऐसी छुट जाती है
आगे चलकर बहुत याद आती है
कुछ हंसाती है कुछ रुलाती है
कुछ मिलाती है कुछ भुलाती है
कुछ भी कहो यारो बचपन कि धुल भरी यादें निराली होती है

एक छोटा सा प्रथम प्रयास जसनाथी गोविंद कृष्णा लेघा द्वारा

 

   

  जी के जेसनथी

मीथिसार, बोलै, बारमेर

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