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‘बेरोजगारी गतिमान है”कविता-प्रतिमा-माधुरी

पढ़ा रही थी बच्चों को पाठ
पाठ में था प्रभु से पाने का वरदान
मैंने पूछा आप लोग भी तो
भगवान से कुछ न कुछ मांगते होंगे।

एक मासूम सीबच्चीखड़ी हुई
मैंने पूछा बेटा देखकर तो लग रहा है
की पूजा भी तुमने आज किया है
पूजा किया तो प्रभु से मांगा है क्या?

बच्ची कुछ ना बोली तो जोरदिया फिर
बोली बहुत मासूमियत से वह
मैंने मांगा है कि पापा मेरे
जल्द से चले जाए परदेस।
यह सुनकर दिल धक से कर गया
क्योंकि बचपन में मैं भी बस
प्रतिदिन निहारती थी डाकिए को
डाकियाआएगा झोले में से निकालेगा पत्र
पत्र में होगा पिता की नौकरी का संदेश।

नौकरी के बाद मिलेंगे अच्छे-अच्छे कपड़े
टॉफी पैसेऔरमिलेंगे खाने को गट्टे
फीस और कॉपी के लिए बार-बार
कक्षा में खड़ा नहीं किया जाएगा।

निहारते निहारते कई वर्ष बीत गए
प्रभु को मनाते मनाते कई दशक बीत गए
ना कोई डाकिया चिट्ठी लाया
न ही प्रभु ने फरियाद सुनी।

कोमल मन भी बहुत आहत हुआ
आंखें राह देखते-देखते थक गई
प्रभु के ऊपर से आस्था भी
कुछ दिन के लिए उठ गई थी।
लेकिन बेरोजगारी अभी गतिमान।
समाप्त
प्रतिमा माधुरी
केजीबीवी अजमतगढ़ आजमगढ़
उत्तर प्रदेश

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