बेटीयां-दीपांशा श्रीवास्तव

बेटीयां-दीपांशा श्रीवास्तव

मैं मोती हूं, एक माला की,
मैं खुशबू हूं एक फूल की।
मैं खुशी हूं एक मां की,
मैं लाठी हूं एक पिता की।
मैं इज्जत हूं एक घर की,
मैं जिम्मेदारी हूं एक पिता की।
मैं मजबूरी हूं लाचारी की,
मैं मूरत हूं दुआंओ की।
मैं खुशी पूरे घर की ,
मैं उदासी उस छोटी सोच वाले जहां की।
मैं उमंग हूं ऊंचाइयों की,
मैं सोच हूं पक्षियों की।
मैं जरूरत हूं सारे जहां की,
फिर मैं क्यो मनूहुसीयत हूं इस संसार की।
मैं तो चांद को भी छू लिया,
फिर भी मैं न रह पाई लोगो के दिलो में।
किसी को मैं भगवान की मूरत लगती हूं,
और किसीको मनुसियत की सूरत लगती हूं।
कोई मुझे अपने दिल में बसा लेना चाहता है,
और कोई इस दुनिया से मेरा नाम और निशान भी मिटा देना चाहता हैं।
कोई सोचता है मेरे बिना ज़िंदगी पूरी नहीं होती ,
और कोई सोचता है जिंदगी में मेरी ज़रूरत नहीं होती।
कोई मुझ पर अपनी‌ हसती भी कुर्बान कर देना चाहता है,
और कोई मेरी ही हसती मिटा देना‌ चाहता है।
मैं ही हूं वो , जो किसी की गलती की सजा नहीं देती,
मैं ही हूं वो, जो ज़हर की एक-एक घूंट हूं पीती।
फिर भी
मैं गौरव इस जहां का ,
मै गर्व अपने पिता का।
मैं खुशी हूं एक मां की,
मैं लाठी हूं एक पिता की ।
मै मोती हूं एक माला की,
मै खुशबू हूं एक फूल की।

 

दीपांशा श्रीवास्तव
शाजहांपुर,उत्तर प्रदेश

 

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