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बेटियाँ-प्रसाद विष्णु

तुम कल का सुखद स्वपन्न हो
पत्नी, बहन, माँ कई रुप तुम्हारे
पर सबसे पहले तुम सुता हो।
क्यों आज इतनी व्याकुल सी
दुख तिरस्कार सहती, क्या अब भी हमारी
कुण्ठित मानसिकता हैं की बेटा हो।
दयाभाव, समर्पण, धैर्य तुम्हारे ये नाम
हर-पल इनको उज्ज्वलित करती हो।
फ़िर क्या बात हैं जो तुम्हारा मन भर आया
क्या इस बात का डर हैं
कि तुम बेटा नहीं बेटी हो।
इन्सान ये जो खुश होता
इस बात पर की बेटा हो।
कल को न वो सहारा देता
तभी अचानक तुम हो आती ये कहते
मैं हूँ तुम्हारी प्यारी गुड़िया
फ़िर तुम बाहें-भर क्यों रोते हो।
दूर जा बेठते कोने में
फ़िर कहतें हो तुम ही मेरा बेटा हो।
पापा मैं अब भी सहमी-सी रहती हूँ
जब ये सोचती हूँ की संसार
मुझे इस रुप में कम स्वीकार करता हैं
अब आप ही बताओं न पापा मेरा कल कैसा होगा
बेटी हो या बेटा हो क्या एक जैसा ही होगा।
-प्रसाद विष्णु

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