भगत सिंघ-दीप जांगड़ा

भगत सिंघ-दीप जांगड़ा

आंगण बीचालै ठंडे रूख की सीली छाँ बरगी थी ।
जिस कौख तै जन्मया भगत सिंघ वा माँ भी माँ बरगी थी ।।

वा ज्योत थी जिसकी लो दिखला गी चांदना आज़ादी का
हाल देख री थी वा माँ लोगों भारत की बर्बादी का
कदे भीतर कदे बाहर मरैं थे खेत बाढ़ नै खाया था
हाल देख कै भारत का एक माँ नै भगत सिंघ जाया था
अंग्रेजाँ ख़ातर तो वा जननी भारत माँ तूफां बरगी थी ।।
जिस कौख तै जन्मया भगत सिंघ वा माँ भी माँ बरगी थी ।।

आज तो फुकरे राँझे जामै किसनै पड़ी आज़ादी की
कोई नशे नै मार दिया कोई राह पकडै बर्बादी की
कोई खा गया देश नै भीतर तै कोई बाहर लगावै बोल्ली लोगो
फेर तै बणै गुलाम यू भारत जै हमनै आँख ना खोल्ली लोगो
घणा ख़ून बहा कै ल्याये थे आज़ादी देश की जां बरगी थी ।।
जिस कौख तै जन्मया भगत सिंघ वा माँ भी माँ बरगी थी ।।

कोई कहै छपा दयूं नोटां पै कोई फेर बुलावै भगत सिंघ
गीतां आले इस देश मैं मुड़ कै क्यूकर आजावै भगत सिंघ
जित जन्मै पापी अधर्मी वहसी गुंडे भारत देश मैं
बेरा ना मिल जांवै ज़ुल्मी कित कड़ै किसे भी भेष मैं
कित खो गी प्रीत उस भारत की जो गां बरगी थी ।।
जिस कौख तै जन्मया भगत सिंघ वा माँ भी माँ बरगी थी ।।

“दीप” जले तै सर ज्या गा ना बिन बोल्ले इब कदे सरै
तू भगत सिंघ नै बुलावै सै इसका मतलब तू आप डरै
क्यूँ तड़फावै उस रूह नै “जांगड़ा” वो सारे हाल नै जाणै सै
उसका भारत इब ना सै रै अपणा भारत वो पीछाणै सै
ख़ुद क्यूँ ना बण्या भगत भोले तनै जनण आली भी माँ बरगी थी ।।
जिस कौख तै जन्मया भगत सिंघ वा माँ भी माँ बरगी थी ।।

 

  दीप जांगड़ा

 

 

 

 

 

Deep Jangra

मैं दीप जांगरा कैथल हरियाणा का निवासी हुँ। मैं वीर रस का कवि हूँ।

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