भगवान की अतुलनीय देन है बेटियाँ – ओमेंद्र सिंह

भगवान की अतुलनीय देन है बेटियाँ – ओमेंद्र सिंह

कहते हैं भगवान की अतुलनीय देन है बेटियाँ
होता है जब जन्म उसका, तो माँ-बाप के घर-आंगन में आ जाती है बहार
खिलखिलाहट से उसकी चहक उठता है उनका संसार
रखा जाने लगता है उसकी हर खुशी का ध्यान
माना जाने लगता है लक्ष्मी का रुप उसे
माता-पिता उसके भविष्य की सोच,
उसकी शादी को ही अपना लक्ष्य मान
सब संजोना शुरू कर देते हैं उसके लिए
कहने को तो कहते हैं हमेशा यही कि बेटियाँ होती हैं पराया-धन…
पर भूल बैठते हैं कि वो रहेगी हमेशा उनका अंग
पाल-पोष कर अपनी मासूम-सी कली को
सिखाते हैं.. दुनियादारी की बातें सारी
ताकि ना रह जाए कोई कमी, उसके बनने में आदर्श नारी
हर गुर सिखाते हैं अपनी तरफ से उसे घर-संसार चलाने के….
करके मजबूत खुद को हो जाते हैं तैयार
सौंपने को अपने कलेजे का टुकड़ा किसी और को
ये मानकर कि यही है रीत, इस कठोर समाज की
पाई-पाई कमाई हुई पूँजी को लुटाने
दहेज पर रहते हैं राजी हमेशा
क्योंकि उन्हें निभानी होती है समाज की ये प्रथा
कर बैठते हैं भूल ना समझकर
कि उनकी बेटी नहीं, उसके साथ जा रहे
पैसे और सामान से है दहेज वालों को प्यार…
रिश्ता नहीं करते हैं दहेज लोभी, उनके लिए ये होता है सौदा
अपनी लाडली की खुशी के लिए ही..
मन मसोस कर, उसका भला सोचकर
उसे प्यार से सजाकर दुल्हन बना कर देते हैं विदा
पर क्या लालच की नींव पर किसी ने सुख पाया है??
क्या लालचियों को कभी कोई संतुष्ट कर पाया है??
उनके घर जाकर उन माँ-बाप की
लाडली ने खुद को हमेशा सबसे अकेला पाया है
जिस सम्मान की आस में
उसने विश्वास के साथ जीवन भर
का था रिश्ता जोडा़..
जिसके लिए उसके पिता ने
नहीं छोड़ा कसर थोड़ा..
उसी दहेज की आग ने उसके
आत्मसम्मान को तिल-तिल जलाया है..
पर फिर भी दुनियादारी की सोच
रिश्तो का मान रखने के लिए
उस बेटी ने अपना फर्ज बहु बन निभाया है
कभी उफ ना करते हुए उनकी लाडली ने
हमेशा हँसते हुए अपना दर्द छुपाया है
पर क्या माता-पिता से कभी कुछ छिप पाया है?
उन्हें भी सब खबर है, पर विदा कर दी गई बेटी
के आँसु को कौन माँ-बाप पोंछ पाया है?
आज ये दुनियादारी पड़ी उन पर बड़ी भारी
काश! समझा होता असली रिश्तेदारी
काश! उन्होने अपनी लाडली का रिश्ता
सही जगह करवाया होता..
थोड़ा सा सब्र रखा होता..
किसी होनहार-समझदार लड़के से
अपनी बेटी का रिश्ता करवाया होता..
तो इस तरह उन्हें अपनी लाडली के
अरमान टूटता हुआ नजर ना आया होता
पर भी आज यहाँ दहेज के नाम पर कुप्रथा है जारी
आज भी बेटी की खुशियों का हवाला देकर
उनमें ग्रहण लगाना है दुनियादारी
दहेज को यहाँ मान-सम्मान की कसौटी पर है तौला जाता
और अपने आत्मसम्मान को इस कुरिति तले खुद ही है रौंदा जाता
अमीर हो या गरीब हर कोई, इस आँच में है झुलस रहा
पर आज भी हर कोई इसके आँच को बढ़ावा देने आग में है घी झोंक रहा
नहीं है हिम्मत किसी में यहाँ कि कर पाए इसे ना
यहाँ तो हर लड़के के माँ-बाप अपने बेटे को हैं बेच रहें
दहेज के बाजार में बढ़-चढ़ के लगाते हैं बोली…
करते हैं तय कीमत अपने ही परवरिश की..
और कहलाते हैं सम्मान के अधिकारी भी

omendra singhओमेंद्र सिंह

कासगंज

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