भरी-भरी कलम…(चेतन वर्मा)

भरी-भरी कलम…(चेतन वर्मा)

खाली खाली पन्नों पर भरी-भरी कलम लगती है..
पास होती हो जब तुम मेरे
यह काली रात भी
नई नवेली दुल्हन सी लगती है

दूर रहकर जो तुम
बिना बोले बात करती हो
चांदनी रात भी फिकी सी लगती है

साथ में मेरे बैठकर
यूं जो रोब जमाती हो मुझ पर
कितनी मासूम सी घड़ी लगती है

गोद में बैठकर खाना खिलाना
प्यार से लड़ना और लड़कर बाहों में भरना
कितनी सुकून से जिंदगी लगती है
खाली खाली पन्नों पर भरी-भरी कलम लगती है…

चेतन वर्मा
(बूंदी) राजस्थान

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