बिन्दु सगुन के तपते मोती-जीतपाल सिंह यादव आर्यवर्त

बिन्दु सगुन के तपते मोती-जीतपाल सिंह यादव आर्यवर्त

पाखण्डों के बीच फंसे हैं श्री राम फिर तम्बू में।
पारदर्शिता लोशों की हर रोज दिख रही जम्मू में।

कर संहार मात जग जननी, जन की लाज बचाले तू।
मानवता का नाच नग्न है, भारत भस्म रमाले तू।

यदि खून की छींटें तेरे, तन पर जाकर गिरती हैं।
देख भवानी, जगदम्बा सी बेटी निश्दिन मरती हैं।

जन नायक भी गद्दारी ले नाम तेरे से करते हैं।
इंसानों को जाति धर्म में बांट कुलिच्छित करते हैं।

जीव धर्म के कृपा सूत्र का अंकुश आग उगलता है।
चारों ओर विश्व भींषण सा मानव रोज सुलगता है।

खप्पर धरणी जाग भवानी, नग्न तेग ले असुर हनो।
भारत माँ पीड़ा में जलती, दुर्गे आए सहाय बनो।

अर्जुन कहीं नजर नहीं आता, वेग बिन्द्र दूशासन है।
कहीं कृष्ण के संग न राधा, कंस राज सा शासन है।

सिंहासन पर रावण बैठे, ऋषि धरा को त्याग चले।
धर्म राज के नाम कुछ नहीं, पाप नाम की छाप चले।

सूत्र सरोवर सखा सिन्ध में, हिन्द डूबता जाता है।
यहाँ फाग के गीतों में भी, राग मल्हारें गाता है।

यद्यपि कुछ संभव न होता, तदपि कुपोषित हवा हो गयी।
संस्कृति के नाम सुशोभित, हत्यारों की सभा हो गयी।

अब तो सुध लो चक्रवीरता, बहुधा जल कर राख हो गयी।
निर्लज्जों की साख उग रही, मानवता जन कहाँ सो गयी।

बिन्दु सगुन के तपते मोती, बालाओं के रोज टूटते।
कन्याओं पर विश्व भेड़िये पहाड़ बन कर लाश कूटते।

“जीत” शंम्भु की टेर लगाये, दृश्य देख हिय बिन्दु कांपता।
अवलाओं के कष्ट निवारो, जग जननी के चित्र झांकता

 

जीतपाल सिंह यादव आर्यवर्त
 पवासा ,उत्तर,प्रदेश

 

 

 

 

 

 

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